शुक्रवार, 14 सितंबर 2012

कहानी : जिद्द

              आज ट्रेन ज्यादा नहीं सिर्फ एक घंटे बिलम्ब हुई । रात भी काफी हो चुकी है ।  सोचने लगा ज्यादा तो हम छोटे शहर वालों के लिए है जो जल्दी खाना खाकर इस समय तक सो भी जाते हैं । बड़े - बड़े शहरों में तो दस बजे का मतलब कुछ खास नहीं ।  उतरते ही ऑटो वालों के बड़े से झुण्ड ने जगन को घेर लिया ।
"बाबू जी होटल जाना है .... बढ़िया एकदम आपकी रेंज का .....।"
" कंहा जाना है आपको कुछ बताओ तो सही .....सही - सही पैसे लगा दूंगा ।"
" मुझे भी घर जाना है .... बाबू जी बढ़िया होटल दिलाऊंगा  .....सारी सुबिधायें ....।"
 वे सारे इस तरह टूट पड़े मानों आज उस स्टेशन पर केवल वही उतरा हो । जबकि एसा नहीं था । कितनी धक्का मुक्की कर उतर पाया था ट्रेन से । उस स्टेशन पर ट्रेन रुकने का समय मात्र दस मिनट । उस दस मिनट में भी दस कुल्ली पहले ही डिब्बे में घुस गए । लोग भी न जाने कंहा से इतने बड़े - बड़े सूट केस ले आते हैं जो सवारियों से पहले ही दोनों तरफ किवाड़  बनकर  खड़े हो जाते हैं । किसी तरह वो किवाड़  खुलते भी हैं तो बाहर से अन्दर आने वाले आड़े - तिरछे किवाड़  खड़े हो जाते हैं । एक ऑटो वाला उसे बाकियों से कुछ अलग लगा ।
 "लाइए बाबू जी ....सामान मुझे पकड़ा दीजिये ... इसके पैसे नहीं लूँगा ... देख रहा हूँ आपने उतनी देर से इसे जमीन पर तक नहीं रखा ... लाइये संकोच मत कीजियेगा ..... ।"
उसने जगन के हाथ से अटैची हाथ में और बैग कंधे पर टांग लिया ।
"आइये मेरे साथ वह सामने ही खड़ा है मेरा ऑटो ।"
 जगन उसके पीछे - पीछे ऑटो तक पंहुच गया और उसमे बैठ गया । उसे उस ऑटो वाले में अपने छोटे भाई की शक्ल नजर आने लगी । एसा ही तो है एकदम बच्चा सा । पैंट कमर पर अटकी हुई । बाल आगे से मुर्गे की कल्की की तरह खड़े । वही चलने का स्टाइल ... कितनी बार टोका इंसानों की तरह रहा कर । अपनी भाभी से कहता  'भय्या को बोल दो जब मै उनकी उम्र में का हो जाऊँगा तब उनकी तरह बन जाऊँगा अभी बख्स दो मुझे ' कहता हुआ कानों को हेड फ़ोन से ढक गायब हो जाता । और ... अब ...न जाने कंहा धक्के खा रहा होगा ।काश आज पिताजी जिन्दा होते तो यह नौबत क्यों आती । दुनिया तो यही कहेगी न कि निकाल दिया अपने  छोटे भाई को घर से । वह एकटक उसी ऑटो वाले को देखे जा रहा था जो मोबाइल  पर बात करने में मशगूल  था । मोबाइल को एक तरफ रखते हुए
"भय्या कंहा जाना है आपको ।"
उसके मुख से  भय्या शब्द का  उद्बोधन सुन  उसका मन भर आया । चुपचाप दोस्त के द्वारा बताए गए होटल का नाम और पता लिखी पर्ची उसके हाथ में पकड़ा दी ।
 "भय्या यह तो दूर है ..... सत्तर रूपये लगेंगे  ।"
 " चलो ......।" हाथ से इशारा करते हुए वह बोला ।
जगन की डबडबाती आँखों को उसने देख लिया । वह समझ गया कि सवारी किसी बात को लेकर जरूर  परेशान है । मन ही मन सोचने लगा कंही मैंने इनसे ज्यादा पैसे तो नहीं मांगे .... नहीं ....नहीं ..... दिन के बक्त भी सवारियों से पचास - साठ रूपये तो ले ही लेता हूँ । यह तो वेसे भी रात का समय है । स शर्दी में कानो को भी जितना मर्जी ढक लो । तब भी  सुन्न पड़ जाते हैं ... यह तक नहीं सुनाई देता कि सवारी क्या कह रही है । हां सामने से आती गाडी की रोशनी से भले ही सामने वाले शीशे में उसकी गति बिधियाँ पता चलती रहती हैं । आजकल गाड़ियाँ भी तो बाज़ार में एक से बढ़कर एक आ गयीं हैं । एक तो शर्दी से उस पर किसी  किसी गाडी का होरन एसा कि कान में पड़ते ही कुछ देर के लिए जैसे कान बहरे हो गए हों  । जरा कान खुलते भी हैं तो तब तक उसका बाप पीछे से प्यां -प्यां करने लगता है । और उन गाड़ियों की रोशनी बाप रे बाप । शैतान को याद करो और वो हाज़िर । भैंसा बुग्गी से टकराते टकराते वह बाल - बाल बचा । कुछ देर के लिए तो लगा  अंधा ही हो गया । वही क्या जगन को भी तो कुछ नहीं दिखाई दिया । लेकिन उस झटके ने उसकी तन्द्रा जरूर भंग कर दी जो अपने छोटे भाई मगन के ध्यान में मग्न थी । जगन तो कुछ नहीं बोला झटके से भले ही दोनों के सर टकरा गए लेकिन किसी ने भी दर्द का एहसास नहीं होने दिया । ऑटो वाला ही बोल पढ़ा
 "कैसी - कैसी लाइटें लगा देते हैं मादर .....।"
 बोलते - बोलते ठिठक गया ।
" देखा भय्या आपने ... इन बड़ी - बड़ी गाडी वालों के लिए तो कोई कुछ बोलता नहीं .... और हम जरा कंही डिप्पर भी मार दें तो .......चलो यह आ गया आपका होटल ... । "
कहते - कहते उसने ब्रेक लगा दी । लेकिन उस ऑटो वाले के मुंह से भय्या शब्द सुनने से अभी मन नहीं भरा था । सोचने लगा यह होटल जल्दी क्यों आ गया मैं तो इसका नाम भी न पूछ पाया । छोडो नाम जानकार करूंगा भी क्या ...... कौन सा यह मेरा भाई है । वह भी इसकी तरह होगा कंही ......जब अक्ल ठिकाने आ जायेगी अपने आप आ जायेगा । अब गुस्से और पीढ़ा के मिश्रित भाव से उसके माथे की लकीरें मोटी - मोटी हो गयी ।
"लो भाई अपने पैसे काटो  ।"
कहते - कहते उसने सौ का नोट ऑटो वाले के हाथ में थमा दिया । ऑटो वाले ने भी आधे घंटे पहले और आधे घंटे बाद वाले भाव सवारी के चेहरे पर पढ़ तीस रूपये लौटा कर घर्रर्र ........घर्रर्र ........घर्रर्र ......करता हुआ दूर चला गया । अब मगन दोस्त द्वारा बताए गए होटल में आ पंहुचा । उसके पंहुचने से पहले ही दोस्त ने वंहा फ़ोन कर दिया था । इसलिए रिसेप्सन पर भी ज्यादा देर न लगी और वह सीधे तीसरे माले के रूम नंबर दस में जा पंहुचा । रूम ब्वाय सामान एक तरफ रखते हुए बोला
"यह रहा साहब आपका कमरा .... यह टीवी का रिमोट .... मै पानी लेकर आता हूँ ..... और कुछ चाहिए तो .... बता दीजिये ....... सब हाज़िर हो जायेगा  ।"
आजीब सा मुंह बनाकर उसने कहा । जिसे जगन पढ़ नहीं पाया ।
 "एक कप चाय मिल सकती है  ।"
रूम ब्वाय समझ गया यह तो एम्मी कस्टमर है ... । झटपट गर्दन हिलाता बोला
" इस बक्त तो चाय सिर्फ आपको यंहा से आधे किलोमीटर दूर सीमत की ठेली पर ही मिल पायेगी ।"
कहते - कहते वह जाने लगा
"किधर पड़ेगी वो ठेली ....।"
"होटल से बाहर निकलते ही बांये हाथ पर चले जाना सीधे .........।"
 कहता - कहता वह फटाफट गया ... पानी का जग और गिलास वंहा रख जाते - जाते मुड़ा .
" साहब वेसे इतनी रात को उधर जाना ठीक नहीं ..... यह इलाका वेसे भी ठीक नहीं ..... आप कहो तो बिना दूध वाली चाय .......।
" नहीं ...नहीं तुम जाओ ....... ।"
न जाने क्यों उसे वह रूम ब्वाय अच्छा नहीं लगा । एक दम उस ऑटो वाले के बिपरीत ..और अपने भाई के  उस .....दोस्त जैसा जिसके साथ वह अपने जीवन से खिलवाड़ कर घर से भाग गया । बाथरूम भी कमरे से लगा हुआ था । हाथ मुंह धोकर पलंग पर निढाल वह  कमरे की छत को निहारने लगा जिसके दोनों कोनो में मंद रोशनी से दो छोटी - छोटी लाइटें जल रही थी और एक खामोश पंखा झूल रहा था । परन्तु बार - बार उसकी आँखों के सामने मगन की भोली सी सूरत और वह पत्र घूमने लगता जो वह अपने तकिये के नीचे छोड़ कर गया 'भय्या ! पहली बार मैने एक जिद्द की थी । क्या हो जाता अगर आप मुझे मोटर साईकल दिला देते ?  मेरे सारे दोस्त अपनी - अपनी बाइकों से स्कूल आते हैं और मै उस सरकारी खचड़ा बस या दोस्तों से लिफ्ट मांग - मांग कर  । आज पिताजी जिन्दा होते तो वह एसा नहीं करते । मैंने कहा था न मोटर साइकिल नहीं दिलाओगे तो मै घर छोड़कर भाग जाऊंगा । मै जा रहा हूँ .... अपना भविष्य खुद बना लूँगा । आप मेरे भविष्य के लिए वेसे भी ज्यादा चितिंत रहते थे  ।  मुझे क्या करना है । मैं जानता हूँ । आप फिकर न करना भाभी को भी समझा देना और कहना मुझे माफ कर दे । जिस दिन कुछ बन जाऊँगा तब ही आपके सामने आऊंगा ।'
" काश ! ऐसे ही ही हो मेरे भाई .......। "
अनायास ही उसके मुंह से निकला । लेकिन जगन भी आखिर क्या करता कैसे दिला देता एक नाबालिग को मोटर साइकिल ....। दूसरों की देखा देखी उसे वेसे भी पसंद नहीं थी । अभी - अभी तो भाई ने  दशवीं पास किया और ...।  कह तो दिया था ...बारहवीं एक्जाम के बाद ही दिला दूंगा .... नहीं माना तो मेरा  क्या ...? लेकिन उसने कभी सपने में भी एसा नहीं सोचा कि मगन जैसा लड़का एसा करेगा  । दूसरों के सामने कितनी  प्रशंसा करता था वो उसकी  । खीजता  हुआ बुदबुदाया
 " हो सकता है वह  ..... कोई  बहाना ढूँढ रहा हो ..।"
 जगन गुस्से में  उठ बैठा । कमरे में ताला लगाया और चला गया होटल के बाहर सड़क पर बांयीं तरफ । पहले की अपेक्षा अब  सड़क पर कम ही लोग नजर आ रहे थे । सड़क के दोनों तरफ बने फुटपाथों पर कुछ लोग अलग - अलग गुट बनाकर अपने - अपने बिछोने बिछाने में  जुटे थे । उस शर्दी में भी जो स्वेटर उसने पहन रखी थी अब उसे वह  बोझ महसूस हो रही थी । कुछ ही क्षण में सीमत की ठेली आ गयी । सर से पैर तक ठेली वाला  एसा ढका था कि उसका असली चेहरा नज़र ही  नहीं आ रहा था । उसे क्या कह कर संबोधित करे जगन को कुछ भी नहीं सूझ रहा था । उसके कानों में अब भी ऑटो वाले द्वारा कहे शब्द भय्या - भय्या गूँज रहे थे । इसलिए भय्या बोलना ही उचित लगा ।
"भय्या एक चाय बना दो  ।" बोलते हुए नाले के ऊपर बनी पुलिया पर बैठने की सोचने लगा "
"बैठो बैठो  बाबू  जी ..... सभी लोग यंही बैठते हैं "  अच्छी  जगह भला कौन लगाने देगा मुझ गरीब को अपनी ठेली  .... पिछले बीस सालों से इसी के बदोलत पाल पोश रहा हूँ अपने परिवार को ...."।
वह था की चुप होने का नाम ही नहीं ले रहा था ।
"जरा अच्छी सी बनाना कल से चाय नहीं पी ढंग की "।
"अच्छी  ही बनाऊंगा ... इतनी ठण्ड में जो आये हो ..... लगते भी चाय के शौकीन हो .....वरना आजकल तो लोग दूसरी चाय ज्यादा ढूँढ़ते हैं ।"
 कहता हुआ वह पतीली दुबारा से साफ कर स्टोव तेज करने लगा । सचमुच स्टेशन से आते हुए एक जगह पूरी सड़क जाम देख ऑटो वाले से पूछा भी था क्या हो गया यंहा पर ........? उसने मुस्कुराते हुए कहा भय्या दरशल यंहा पर देशी  ठेका है । कितना बचते बचाते ले गया था वह ऑटो को वंहा पर  । एसा लग रहा था जैसे चुनाव से पहले उम्मीदवार अपने बोटरों को फ्री में कुछ बाँट रहा हो । यदि वो रात भर के लिए खुला रहें  तो कई शौकीन तो  अपना घर - बार भूल जाएँ । इस चाय वाले के पास देखो .......।
" आप कब तक यंहा पर रहते हो .... ।" अभी कितना बजा है  ।"
 "पौने ग्यारह  ।" स्वेटर की बांह ऊपर खिसकाते हुए जगन ने  घड़ी पर नज़र दौडाई । उस जगह पर सरकारी लैम्प पोस्ट की रोशनी अच्छी खासी   थी  बजाय और ।
"आजकल जब शर्दी ज्यादा है .... ग्राहक भी खास नहीं  .....  फिर जल्दी क्यों नहीं जाते ..?" कुछ संकुचाते जगन ने पूछा ।
"जल्दी चला जाता तो आपको भला चाय कंहा मिलती ....."।  हंसी  के साथ ही उसके पूरे चेहरे के साथ साथ   बिना दांतों वाला खुला हुआ मुंह नजर आया ।
" बात तो बिलकुल सोलह आना सच है "
"बाबू जी इंसान को हमेशा कोशिश करनी चाहिए नियम पूर्वक जिन्दगी बिताए । मैंने इन बीस सालों में चाहे शर्दी हो , बर्षात हो या गर्मी उस ऊपर वाले की कृपा से कभी भी अपनी रोजी - रोटी का नियम नहीं तोड़ा "।
"मान गए भय्या आपको "। वेसे चेहरे से तो वह ताऊ लगता था लेकिन पहले भय्या कहा था इसलिए भय्या कहना ही उचित समझा ।
 "मुसाफिर लगते हो " बढी हई दाड़ी खुजलाते वह बोला ।
" हाँ" ।
"टाइम से पंहुच जाना ...जंहा भी जाना हो ......" ।
चाय की प्याली पकडाते - पकडाते  वह बोला ।
"कुछ दूं चाय के साथ ...... बंद मक्खन ...." ।
" हाँ दे दो लेकिन बाद में चाय .... एक प्याली और बना देना बिलकुल ऐसे ही .... "।  चाय बंद मक्खन पुनह चाय पीने और पैसे देने के बाद भी जगन वंही पुलिया पर बैठ कुछ सोच ही रहा था कि  उसने देखा  ठेली वाला अपना सामान समेटने लगा है  । वह समझ गया उसका घर जाने का समय हो गया । वह भी उठ गया रात भी काफी हो चुकी थी । सड़क पर वाहनों की आवा जाही कम हो गयी थी । अब सड़क के दोनों तरफ फुटपाथों पर जगह - जगह पुरानी - पुरानी गुदड़ियों , फटी पुराने टाट- बोरिंयों , कम्बलों में इंसानों को लपेटी गठरियाँ बिखरी थी । कुछ गठरियाँ खामोश तो कुछ के भीतर कुछ हलचल चल रही थी । जगन दबे कदमों से होटल की ओर बढ़ ही रहा था कि सड़क के दूसरी छोर पर कुछ गठरियों के पास एक मोटर वैन आकर रुकी .... आसपास की कुछ  गठरियों में हरकत पैदा हुई  .... और उनमे से एक गठरी को गाड़ी वाले मोटर वैन में डालकर ले गए अपने साथ  । थोड़ी देर के लिए खुसर - फुसर हुई और पुनह शांत हो गयी । जो गठरी गाड़ी में गयी किसकी थी ........क्या थी ......कैसी थी .... ठीक से दिखाई नहीं दिया  । देखने के चक्कर में शुक्र है किसी ने देखा नहीं । सोचकर वह अब भी एक एक गठरी को यह देखता हुआ आगे बढ़ रहा था कि क्या पता इन गठरियों में ही वह चेहरा नज़र आ जाय  जिसके लिए वह पिछले पांच दिन से दर - दर भटक रहा है । लेकिन एसा कुछ नहीं ।  देखते ही देखते होटल आ गया । रूम बॉय गेट में घुसते ही बोला
"कंहा चले गए थे साहब ..... इतनी रात को हमें तो ..... खैर ....आपके किसी दोस्त का फ़ोन आया था ।" थके हारे से उसने पूछा
"क्या कह रहा था  "।
" आपके पंहुचने के बारे में "।
" वह तो तुमने बता ही दिया होगा "।
" हाँ ...लेकिन साहब ....वो किसी .......म ..... ग ......हां मगन ....के बारे में कुछ ..... "।
मगन का नाम सुनते ही वह सीढ़ियों से एकदम वापस लौटता हुआ .......
"क्या कहा उसने मगन के बारे में .........जल्दी बताओ ......"।
"वह जी कुछ याद नहीं ......अभी दुबारा फ़ोन आएगा उनका ..."। झुंझलाते हुए उसने कहा । जगन समझ गया कि रूम बॉय उससे खुश नहीं रिसेप्सन के पास ही गणेश जी की आकृति में ढली घड़ी की तरफ देखा जो साढ़े ग्यारह बजा रही थी । अपने सर पर हाथ मारते हुए मन ही मन खुद को कोसता हुआ ... कमबख्त मोबाइल को भी आज ही खोना था .... लगता है ट्रेन से उतरते बक्त किसी ने हाथ साफ कर दिया .... या कंही गिर गया ..... । उस ऑटो ने वाले ने  कितनी बार उस नंबर पर फ़ोन भी किया लेकिन स्विच आफ ....... । इधर - उधर फ़ोन करके भी उसने देखा ....। चलो अच्छा ही हुआ .... वेसे भी उस दिन से हर कोई अफसोस कम  सलाह ज्यादा दिए जा रहा था । पुलिस को कम्प्लेंट क्यों नहीं की ...... ? अखबारों में क्यों नहीं छपवाया  .........?   टेलीविजन में दे देते तो  .....? बगैरह - बगैरह ......। वेसे भी आजकल कमुनिकेसन  भी इतना  सुपर फास्ट हो गया  कि छोटी सी घटना मिनटों में पूरी दुनिया में फैल जाती है । फिर भला यह मगन के घर से भाग जाने की खबर  कैसे अछूती रह सकती थी । लेकिन इस इलेक्ट्रोनिक युग में जन्हा सूचनाओं का भारी बिस्तार हुआ वंही जगन को लग रहा था कि वह  अब पहले से कितना निकम्मा और भुलक्कड़ हो गया है ।  अब बताओ उसे  अपनी पत्नी तक का भी मोबाइल नंबर याद नहीं । पहले घरों में लैंडलाइन फ़ोन होता था तब एसा न था । सारे के सारे फ़ोन नंबर फ़ोन बुक में ही तो सेव थे । जब भी किसी को फ़ोन करना होता तो नाम से सर्च कर देता था । अब देखो कितना बेबस महसूस कर रहा था वह अपने आप को  ।  इतने में ही आधुनिक लैंड लाइन  फ़ोन की रिंग टोन बजी "चलत मुसाफिर मोह लिया रे पिंजरे वाली मुनिया ...... " जगन भागा - भागा  गया फ़ोन उठाने लेकिन उससे पहले ही रूम बॉय बाजी मार चुका था ।
" यह लो आपकी ही कॉल है " चिडचिडा मुंह बनाते हुए  उसने स्पीकर आन कर  रिसीवर जगन के हाथों थमा दिया ।
" हाँ दोस्त ....."
"दोस्त गया भाड़ में .....  है कंहा तू ..... एक तो सब पहले से ही परेशान हैं ......  ऊपर से तेरा मोबाइल भी स्विच आफ ......... जानता भी है कुछ ......घर से भाभी का कितनी बार फ़ोन .......।" 
"भाई!  मेरा फ़ोन कंही खो गया .इसीलिये ...।"
"कंही से भी तो एक कॉल कर सकता था ।"
" तुझे क्या बताऊँ दरशल मुझे सिवाय उस बेबकूफ मगन के अलावा किसी का नंबर याद ही नहीं आज तक । वो भी उसे तब से ही स्विच आफ करके बैठा है ।"
"अरे ! उसी की तो बात बताने वाला था तुझे  ...... ।"
"हाँ ....हाँ .....ठीक तो है वो .......घर पंहुच गया ......।"
"घर तो नहीं पंहुचा पर फ़ोन आया था उसका भाभी के लिए । मुंबई के किसी एस .टी . डी . से किया ।"
क्या कह रहा था ..... लेने चला जाता हूँ  यंही से ...।"
अरे ! नहीं नहीं ..... उसने कहा वो अपने दोस्त के  साथ ठीक है ...फिकर न करना ... कोई परेशानी होगी तो फ़ोन कर  देगा ।"
"लेकिन उसके पास तो .....पैसे भी नहीं .......।"
"फ़ोन रख  ....बैलेंस ख़त्म होने वाला है ....... अभी भाभी को भी तो बता दूं  तुम ठीक हो .....।"
"अरे ! सुनो तो स ....... कमबख्त ने फ़ोन काट दिया ...।"
 जगन ने गहरी सांस  लेते हुए बाहर आसमान की ओर  देखा  जैसे लम्बी अमावस    के बाद  पूर्णमासी  का चाँद  अठखेली कर रहा हो  । कई बार फ़ोन के रिसीवर को चूमने के बाद जगन ने  उसे गले लगा लिया ।
" साहब ! यह फ़ोन है आपका भाई नहीं .....।"  जगन ने धीरे से फ़ोन के रिसीवर को उसकी जगह रख दिया  और   इतने दिनों  से मन में घर कर चुके अनगिनत कुबिचारों को  तिलांजलि देते हुए पहले माले  की   सीढियां चढ़ने लगा ।

@2012 विजय मधुर 

 
 

1 टिप्पणी:

  1. कहानी प्रवाही है और भावनाओं में रची बसी है । अंत सुखद है यह अचछा लगा .

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आभार