सांय का समय घर्र-घर्र की आवाज के साथ घर के अहाते के बाहर ऑटो रिक्शा आकर रुका, जया ने बाहर झांककर देखा तो उसमें से विक्की उतरकर आगे बढ़ा और सीधे अपने कमरे में चला गया | थोड़ी देर बाद जया ने बाहर देखा तो ऑटो रिक्शा वहीं खड़ा था, तो उसका माथा ठनका आखिर बात क्या है ? सीधे विक्की के कमरे में चली गई, तो देखा विक्की सामान को समेटने में लगा है |
"क्या तुम यहां से कमरा बदल रहे हो |" जया ने विक्की का हाथ पकड़ते हुए कहा |
"जी ..."
"अचानक...? किसी ने तुम्हें कुछ कहा ?" जया ने पूछा |
"नहीं तो | ऑफिस के नज़दीक अच्छा कमरा मिल गया है | इससे काम नहीं चल पा रहा था | एक खाट के अलावा इसमें आता ही क्या है ? गाँव से भी आये दिन कोई न कोई आता रहता है | अम्मा जी को मैंने कल ही बता दिया था | इस महीने का किराया तो पहले ही उनके पास एडवांस में है |"
"अच्छा तो तुम पहले ही ....|" कहते-कहते बरामदे में ठक-ठक बूटों की आवाज सुनकर जया ठिठक गयी |बरामदे से जया की आवाज सुनकर विलास भी वहीं आ गया |
"क्या हुआ, सब ठीक तो है? " विलास ने कहा |
"देख लो | यह विक्की यहाँ से कमरा बदल रहा है |" अपने आप को सँभालते हुए जया ने कहा |
"इसमें हम क्या कर सकते हैं | इसकी मर्जी | देख लो भाई आराम से रहना और अपना ध्यान रखना | कभी भी किसी चीज़ की जरूरत हो तो किसी के हाथ संदेशा भेज देना | तेरा यह भाई हाज़िर हो जायेगा |"
"चलो अब उसको अपना काम करने दो | मैं तो डर ही गया था |" कहते हुए विलास जया को अपने साथ अपने कमरे में ले गया और दरवाज़े बंदकर भीतर से कुंडी लगा दी |
तीनों बच्चे मोहल्ले में खेलने गए हुए थे| अम्मा जी के कमरे से खांसने की आवाज के साथ-साथ कुछ मिली-जुली आवाजें बगल वाले कमरे से विक्की को स्पष्ट सुनाई दे रही थीं |
घर का सारा सामान जिसमें कुछ किताबें, गिने-चुने कपड़े और बर्तन संदूक के भीतर समां गए | रजाई-गद्दा, तकिया और दो चादरें बिस्तरबंद में सिमट गए, प्लाटिक की बाल्टी में मग, साबुन, ब्रश, झाड़ू, पोचा और छोटा-मोटा सामान आ गया | जूट के थैले में स्टोव, तवा, चकला-बेलन और किचन के डिब्बे आ गए | नए कमरे में दो फोल्डिंग चारपाई और एक एक जोड़ी नए बिस्तर की व्यवस्था विक्की पहले कर आया था, इसलिए खाट को वहीं छोड़ दिया | चारों नग ऑटो रिक्शा में समेटकर विक्की ने वापस आकर एक बार अपने उस छोटे से कमरे का निरीक्षण किया | तब तक बगल वाले कमरे का दरवाज़ा खुल चुका था | अम्मा जी, विलास और जया से विदाई लेकर वह सामान के साथ ऑटोचालक के साथ सिमटकर सवार हो गया | जया दूर आकाश में सुर्ख लाल सूरज को एकटक निहारने लगी जो उसकी आँखों से ओझल होने को आतुर था |
"चलो अच्छा हुआ, अपने ऑफिस के पास चला गया | उस दिन की घटना के बारे में सुनकर, मुझे डर बना रहता था |" घनी मूछों पर ताव देते लेते हुए विलास ने कहा |
घटना पंद्रह दिन पहले की थी| जया घर के जरुरी काम-काज निपटाने के बाद जया बच्चों को होम वर्क कराने बैठी ही थी कि बरामदे में पड़ोस के महेश और रुपेश द्वारा विक्की को थामते हुए लाते देख घबराकर दौड़ी-दौड़ी बाहर आयी|
“क्या हुआ विक्की को?” जया ने पूछा |
“भाभी जी विक्की भेल चौक के पास बेहोश पड़ा था | आस-पास लोगों की भीड़
जमा थी| वह तो अच्छा हुआ हमने उधर नज़र दौड़ा ली | वरना बेचारा न जाने कब तक लावारिशों
की तरह नाली में पड़ा रहता | लोग कह रहे थे ‘शराब पीकर नाली में पड़ा है| जब होश
आयेगा अपने-आप उठ खड़ा होगा |'” हांफते हुए पसीने से तरबतर महेश ने पसीना पोंछते हुए कहा |
“भगवान का शुक्र है , बचा लिया , किसी गाड़ी के नीचे आ जाता तो क्या होता ?” जया ने विक्की को सहारा देते हुए कहा |
विक्की के दरवाजे पर पंहुचकर महेश ने उसकी पैंट-कमीज की जेबें
टटोली लेकिन कमरे की चाबी नहीं मिली| शायद रास्ते में कहीं गिर गयी थी |
“अब क्या करें ?” जया की तरफ देखते हुए महेश ने कहा |
“चलो हमारे कमरे में ही सुला देते हैं| जब इसे होश आ जायेगा तब कमरे
का ताला तोड़ देंगें |” अपने कमरे की ओर ले जाते हुए जया ने कहा |
“यही ठीक रहेगा |” महेश और रूपेश ने एक साथ सहमति व्यक्त की |
जया और विक्की के कमरे एक ही बंद बरामदे के भीतर साथ-साथ थे | बरामदे में आगे दोनों तरफ पूरी जाली और बीच में एक जालीदार गेट था और उसी बरामदे के एक छोर पर जया की रसोई सजी होती थी | विक्की की धुंधली आँखे शून्य में और शरीर महेश और रुपेश के इशारों पर गतिशील था | विक्की की हालत देख जया के तीनों बच्चे अपने स्कूल का होम वर्क छोड़कर सहम कर बैठ गए | उनकी कापी किताबे डबल बेड में बिखरी पड़ी थी | जया ने बच्चों की कापी-किताबे एक तरफ कर विक्की के जूते-मौजे उतारे और धूल से सने कपड़ो को अपने दुपट्टे से साफ़ कर दिया | फिर तीनों ने मिलकर विक्की को डबल बेड के दूसरी ओर बिछे दीवान पर आराम से लेटा दिया| बिस्तर पर लेटते ही विक्की जैसे गहरी नींद में सो गया | काफी देर इंतज़ार करने के बाद भी जब विक्की जगा नहीं तो महेश और रुपेश अपने घर यह कहकर चले गए:
"भाभी जी कोई दिक्कत हो तो हमें बुला लेना | फ़िक्र मत करना |"
रात काफी हो चुकी थी| बरामदे के ठीक सामने अकेली मकान मालकिन बूढ़ी अम्मा भी कई चक्कर मारकर अपने
कमरे में सोने चली गयी | जया के तीनों बच्चे खाना खाकर सो चुके थे| विक्की के स्वास्थ्य के लिए चिंतित जया की आँखों से नींद कोशों दूर थी| विक्की का शरीर बुखार से तप रखा था| बेहोशी की हालत में वह बार-बार पुकार रहा था|
“माँ .... माँ .... कहाँ हो तुम .... मुझे अकेला मत छोड़ना |”
शहर आने के एक साल बाद ही विक्की की सरकारी नौकरी लग गयी थी | लेकिन परिवार से अलग अकेला रहने का दर्द क्या होता है | उसे समझ आ गया था | गाँव में भरा पूरा परिवार, शुद्ध आबो-हवा, बड़ा घर, खुला आँगन, खेत-खलिहान, धारे-पंदेरे, नदियाँ, जंगल, पशु-पक्षी, संगी-साथी, नाते-रिश्तेदार सब कुछ तो उसके पास मौजूद था | लेकिन यहाँ परिवार से अलग-थलग वह अपने-आप को बहुत अकेला महसूस कर रहा था | सुबह खाली पेट ऑफिस जाता, चाय नाश्ता और दिन का भोजन अक्सर ऑफिस की कैंटीन में ही किया करता था | रात को मन होता तो गाँव से साथ लाये स्टोव में गिनती के चार बर्तनों में से किसी एक में खिचड़ी पका लिया करता था| गाँव से शहर आये विक्की को दो साल होने को आ गए लेकिन वह अपने-आप को शहरी परिवेश में नहीं ढाल पाया था | लोगों में बनावटीपन और बोल-चाल का लहजा उसकी समझ से परे था | इसलिए बीस साल की उम्र में ही जितना हो सके, चुप रहना उसने सीख लिया |
कमरे से विक्की का दफ्तर आठ किलोमीटर दूर था | गाँधी चौक तक पहले चार किलोमीटर उसे पैदल चलना पड़ता और फिर वहां से अगले चार किलोमीटर नगर बस से वह दफ़्तर पहुँचता था | वापसी में पहले नगर बस और बाकी रास्ता वह पैदल नापता था | इसलिए सुबह जल्दी दफ्तर के निकल जाता और देर शाम को कमरे में लौटता था | आज भी वह बस से उतरने के बाद जब आधे रास्ते तक पहुंचा ही था कि अचानक चक्कर खाकर गिर पड़ा | आधी रात को जब उसे होश आया तो उसने खुद को गलीचेदार बिस्तर में पाया |
कमरे में हल्की गुलाबी रंग की रोशनी पसरी थी| छत पर अपनी पूरी रफ्तार के साथ पंखा घूम रहा था | सामने वाले डबल बेड पर जया के तीनों बच्चे जिनमें दो लड़के और एक लड़की गहरी नींद में सोये थे| तीसरी दीवार के सहारे दो कुर्सियां और एक बड़ा मेज डटा था| कुर्सियों के ऊपर बच्चों के स्कूली बैग तो बड़े मेज के ऊपर खामोश ब्लैक एंड वाइट सलोरा टीवी की स्क्रीन पर कुछ तस्वीरें हरकत कर रही थीं | कुर्सियों के आगे मेज पर क्रोसिया से बुने सफ़ेद रंग के मेज पोस की झालरें पंखे की हवा से मानों टीवी में चल रहे चलचित्रों के हिसाब से करतब करने में अभ्यस्त थीं | दरवाज़े के ठीक ऊपर दीवार घड़ी में पौने एक का समय हो रहा था | विक्की को कुछ समझ नहीं आ रहा था| उसे लग रहा था, जैसे वह कोई सपना देख रहा है | बिस्तर पर लेटे-लेटे वह यह सब देख ही रहा था कि अचानक हल्के गुलाबी रंग का सूट पहने खूबसूरत युवती कमरे का जालीदार दरवाज़ा खोलकर भीतर आयी और उसके सिराहने के पास आकर बैठ गयी| उसके हाथ में पानी से भरा बड़ा कटोरा था | जैसे ही उसने कटोरे से भीगा रुमाल निकाल कर विक्की के माथे पर रखा, विक्की हडबडा कर उठ बैठा |
“लेटे रहो | तुम्हे अभी बुखार है|” जया ने उसे लेटे रहने का इशारा किया |
“मैं यहाँ कैसे ? मैं तो ....|” विक्की आगे कुछ बोलता जया ने छोटे
बच्चे की तरह उसे चुप करा दिया और उसके माथे की गीली पट्टी बदल दी|
विक्की एकटक जया को देखता रहा | विक्की को मोहल्ले में शिफ्ट हुए पूरे छः महीने हो गए थे लेकिन उसने कभी भी जया को ठीक से नहीं देखा था | जबकि अपने कमरे में उसे जया की रसोई के एकदम पास से जाना पड़ता था | कई बार तो विक्की को रास्ता देने के लिए जया को खिसकना पड़ता था | विक्की दूर से ही जय को नमस्ते कर अपने कमरे में दरवाजे बंद कर किताबों में सिमट जाता था | छुट्टी के दिन सुबह ही किसी नई जगह घूमने निकल जाता और देर रात घर लौटता था |
जया के माता-पिता की आर्थिक स्थिति अच्छी न थी इसलिए उन्होंने जया को पढ़ाने के बजाय पंद्रह साल की उम्र में उससे बारह साल बड़े चतुर्थ श्रेणी सरकारी नौकर विलास के संग उसके हाथ पीले कर दिए | दुनियाँ का कोई भी दुर्व्यसन विलास से अछूता न था | नशे की हालत में घर आते ही गाली-गलोज मार-पीट करना उसके लिए आम बात थी | बाईस वर्ष कीउम्र में ही जया तीन बच्चों की माँ बन चुकी थी |
जया भले ही विक्की से छः साल बड़ी तीन बच्चों की माँ थी | लेकिन पहली बार उसने अपने इतने समीप किसी सुंदर योवना को पाया | बक्त की मार से भले ही जया का चेहरा कुछ मुरझाया हुआ था, लेकिन उसके छरहरे बदन, लम्बी नाक, गोल चेहरा, हिरनी जैसी आँखें, माथे पर चंद्राकर बिंदी देख विक्की
मंत्रमुग्ध हुए बगैर न रह सका | क्षण भर के लिए वह भूल गया कि वह बीमार है और क्या कर रहा है | दिन भर स्कूल और घर में उछल-कूद करते बच्चे समझो घोड़े बेच कर सो रहे थे| टीवी में चल रहे चलचित्रों की धीमी-तीव्र रोशनी जया के चेहरे के रंग पल-पल
बदलने में मशगूल थी, जो विक्की के मन को और ज़्यादा विचलित करने में कसर बाकी नहीं छोड़ रही थी |
“क्या हुआ ? इतने इतने ध्यान से क्या देख रहे हो, पहले कभी देखा नहीं |” माथे की पट्टी एक तरफ रख
जया ने अपनी हथेली से विक्की के बुखार परखा |
“अब बुखार उतर गया | तुम चाहो तो यहीं सो सकते हो | मैं रोशनी बुझा देती
हूँ |”
“नहीं, मैं अपने कमरे में जाता हूँ |” विक्की उठने लगा |
“इतने दिन तुम्हें पड़ोस में हो गए हैं | चलो किसी बहाने तो सही, तुमने हमारे.. कमरे का दीदार तो किया | क्यों हमसे डर लगता है?” जया ने चुटकी लेते हुए कहा |
“आपसे नहीं | भाई से डर लगता है | मैं जब भी देखता हूँ, वह शराब के नशे
में चूर रहते हैं|” दीवान से नीचे फर्श पर कदम रखते हुए विक्की ने कहा|
“अच्छा तो यह बात है| आज तो भाई दूसरे शहर गए हैं| दो-तीन दिन में
लौटेंगे| अब तो डर नहीं?” जया ने मुस्कुराते हुए पलंग पर बेटी को आगे खिसकाते हुए सिरहाने से कमर को टेक लगाते हुए कहा |
विक्की धीरे-धीरे कदम बढाकर कमरे और बरामदे का जालीदार दरवाज़ा खोलकर बाहर शौचालय में जाने के बाद अहाते में टहलने लगा | आसमान में असंख्य तारे टिमटिमा रहे थे, लेकिन चाँदनी के सुंदर आकर्षक रूप के सामने उसे बाकी सब अदने से नज़र आ रहे थे | बाहर का वातावरण बंद कमरे से ज्यादा सुकून भरा उसे लग
रहा था| उधर दिन भर की थकी हारी जया की आँख लग गयी | जो भीतर हल्का उजाला होने के कारण विक्की को दिखाई दे रहा था| वह खुले आसमान के नीचे तारों की छांव में अपने मन के मैल को धोने भरसक प्रयास कर रहा था,'जिसने विपति में साथ दिया, उसी के प्रति गलत सोच, छी..छी ..'|
“बेटा ! अब कैसे है तुम्हारी तबीयत?” अचानक खिड़की के भीतर से मकान
मालकिन अम्मा की आवाज विक्की के कानों में गूंजी |
“जी ठीक है... मैं तो ....|” ऐसे हडबडा कर विक्की ने कहा जैसे कि बूढ़ी
अम्मा ने उसके मन के चोर को पकड़ लिया हो|
“जाओ! अब आराम करो| तुम चाहो तो मेरे बूढ़े के कमरे में सो सकते हो| मैं
बैठक में खिड़की से सटे दीवान में सोती हूँ | यहां सामने क्या चल रहा है सब दिखाई
देता है|” अम्मा ने अँधेरे कमरे की खिड़की के भीतर से कहा |
“नहीं अम्मा | अभी अपने कमरे में जाता हूँ |” जेबें टटोलते हुए विक्की ने कहा|
“चाबी खो गयी| मुझे मालूम है| ताला कल तोड़ लेना|”
“अम्मा मेरे पास दूसरी चाबी है| मैंने दरवाज़े के ऊपर बने गौरेय्या के घोसले में रखी है|”
कहते हुए विक्की ने पंजों के बल उछलकर चाबी निकाली और दरवाज़ा खोलकर चुपचाप अपनी खाट पर
लेट गया |
दफ़्तर से आते हुए रास्ते में उसके साथ क्या हुआ| वह घर कब और कैसे घर पहुंचा, इन सब बातों से बेखबर विक्की फिर से जया के उस मुखमंडल की अप्रतीम छवि के बसीभूत हो गया जिसने उसके कुंठित मन में अजीब सी उथल-पुथल पैदा कर दी थी | उसे लग रहा था, जैसे जया के मुखमंडल की रोशनी कमरे के जालीदार दरवाज़े को चीरकर उसके अंधियारे मन के भीतर चहलकदमी कर रही हों | अब उसकी आँखों से नींद गायब हो चुकी थी| एक बार फिर से शौचालय के बहाने बरामदे से दूसरे कमरे की भीतर झांका, जया अपने तीनों बच्चों के साथ दीवान की तरफ बेड के कोने में इत्मीनान से सो रही थी| दीवान खाली पड़ा था, शायद जया ने सोचा होगा कि अभी उस पर विक्की आकर सोयेगा | उसे मालूम नहीं था कि विक्की के पास दूसरी चाबी भी है जो उसने छुपा कर रखी है| सामने बंद खिड़की के भीतर से अम्मा की खांसी की आवाज सुनकर विक्की वापस अपने कमरे में लौट गया |
अगले दिन देर से जागने और उसके अगले दिन रविबार का अवकाश होने के कारण विक्की को घर में ही आराम करना पड़ा| इन दो दिनों में जया ने सुबह चाय से लेकर रात को खाने तक की विक्की को दिक्कत नहीं होने दी | जया को जब भी अपने काम से फुर्सत मिलती, बक्त बेबक्त विक्की के पास आ जाती थी और उसके संग देर तक अपना सुख-दुःख साझा करने लगती थी | सामने अम्मा जी को दोनों की नजदीकियां खलने लगी और उन दोनों की तरफ उनकी नजरें पैनी हो गयी थी | जब भी दोनों के आस-पास से गुज़रती तो खांसने लगती |धीरे-धीरे मोहल्ले में बात फ़ैल गयी |
"विक्की भाई! सुना है आजकल आपकी मौज हो रही है |" ऑफिस जाते समय एक दिन रुपेश ने कहा |
"कैसी मौज ?" विक्की ने कहा |
"बनाओ मत | हमें सब पता है |" महेश ने कहा |
"अभी ऑफिस की देर हो रही है | बाद में मिलता हूँ |" कहकर विक्की ऑफिस जाने लगा |
जया और उसके परिवार का सानिध्य पाकर विक्की का उदास मन प्रसन्न रहने लगा था | बच्चे विक्की से अपने स्कूल होम वर्क में मदद मांगने आने लगे, 'अंकल यह प्रश्न कैसे हल होगा?' | विकास भी आते-जाते हाल-समाचार पूछने लगा | 'कैसे को विक्की?' यही बात लोगों को खासकर अम्मा जी को खलने लगी थी | इसलिए विक्की को न चाहते हुए भी वहां से कमरा छोड़कर जाना की एकमात्र समाधान लगा |
@विजय मधुर२८४२६














