मंगलवार, 28 अप्रैल 2026

हिंदी कहानी - जया

                               

घर के जरुरी काम-काज निपटाने के बाद जया बच्चों को होम वर्क कराने बैठी ही थी कि बरामदे में पड़ोस के   महेश और रुपेश द्वारा  विक्की को थामते हुए लाते देख घबराकर दौड़ी-दौड़ी बाहर आयी|

“क्या हुआ विक्की को?” जया ने पूछा |

“भाभी जी विक्की भेल चौक के पास बेहोश पड़ा था | आस-पास लोगों की भीड़ जमा थी| वह तो अच्छा हुआ हमने उस तरफ नज़र दौड़ा ली | वरना बेचारा न जाने कब तक लावारिशों की तरह नाली में पड़ा रहता | लोग कह रहे थे ‘शराब पीकर नाली में पड़ा है| जब होश आयेगा अपने-आप उठ खड़ा होगा |” हांफते हुए पसीने से  तरबतर महेश ने पसीना पोंछते हुए कहा |

“हे ! भगवान | भगवान ने बचा लिया , किसी गाड़ी के नीचे आ जाता तो क्या होता ?” जया ने विक्की को सहारा देते हुए कहा |

कमरे के दरवाजे पर पंहुचते ही महेश ने विक्की के पैंट-कमीज की जेबें टटोली लेकिन कमरे की चाबी नहीं मिली| शायद रास्ते में कहीं गिर गयी थी |

“अब क्या करें ?” जया की तरफ देखते हुए महेश ने कहा |

“चलो हमारे कमरे में ही सुला देते हैं| जब इसे होश आ जायेगा तब कमरे का ताला तोड़ देंगें |” अपने कमरे की ओर ले जाते हुए जया ने कहा |

“यही ठीक रहेगा |” महेश और रूपेश ने एक साथ कहा|

जया और विक्की के कमरे एक कतार में साथ-साथ थे| दोनों कमरों को एक लम्बे बरामदे ने जोड़कर रखा था| बरामदे के एक कोने पर जया की रसोई थी तथा बीच में जालीदार गेट| विक्की की आँखे आधी बंद थी, शरीर महेश और रुपेश के इशारों पर गतिशील था | विक्की की हालत देख जया के तीनों बच्चे अपने स्कूल का होम वर्क छोड़कर दीवान में  सिमट कर बैठ गए | उनकी कापी किताबे डबल बेड में बिखरी पड़ी थी | जया ने बच्चों की कापी-किताबे एक तरफ कर विक्की के जूते-मौजे उतारे और धूल से सने कपड़ो को बेड पर पड़े अपने दुपट्टे से झाड लिया| तीनों ने मिलकर विक्की को डबल बेड पर लिटा दिया| काफी देर इंतज़ार करने के बाद भी जब विक्की को पूरी तरह होश नहीं आया तो महेश और रुपेश अपने घर चले गए| 

रात काफी हो चुकी थी| बरामदे के ठीक सामने अकेली मकान मालकिन बूढ़ी अम्मा भी दो-तीन चक्कर मारकर अपने कमरे में सोने चली गयी | जया के तीनों बच्चे खाना खाकर सो चुके थे| विक्की के स्वास्थ्य के लिए चिंतित जया की आँखों से नींद कोशों दूर थी| विक्की का शरीर बुखार से तप रखा था| बेहोशी की हालत में वह बार-बार पुकार रहा था|

“माँ .... माँ .... कहां है तू .... मुझे मत अकेला मत छोड़|”

गाँव से आकर विक्की को शहर में डेढ़ साल हो गए थे| साल भर के भीतर ही सरकारी नौकरी लग गयी थी | लेकिन परिवार से अलग अकेला रहने का दर्द क्या होता है | वह भली भांति महसूस करता था | गाँव में भरा पूरा परिवार, शुद्ध आबो हवा, बड़ा घर, खुला आँगन, खेत खलिहान, धारे-पंदेरे, नदियाँ, जंगल, पशु-पक्षी, संगी-साथी, नाते-रिश्तेदार आखिर क्या न था उसके पास| लेकिन यहाँ अलग-थलग अकेला| सुबह खाली पेट ऑफिस जाता चाय नाश्ता और दिन का भोजन अक्सर ऑफिस की कैंटीन में ही करता था | रात को मन होता तो गाँव से साथ लाये स्टोव में गिनती के चार बर्तनों में से किसी एक में खिचड़ी पका लिया करता था| गाँव के वातावरण में पले-बढ़े विक्की को शहर की आबो-हवा पसंद नहीं आयी, इसलिए बीस साल की उम्र में ही अधिकतर चुप रहना उसे बेहतरीन उपाय लगा | विक्की का दफ्तर आठ किलोमीटर दूर होने के कारण पहले चार किलोमीटर तो उसे पैदल गाँधी चौक तक चलना पड़ता और फिर वहां से दफ़्तर के लिए सीधी  बस मिलती थी| वापसी में पहले चार किलोमीटर नगर बस से और बाकी चार किलोमीटर पैदल घर तक | इसलिए वह  सुबह जल्दी दफ्तर के निकल जाता और देर शाम को कमरे में लौटना होता था | आज भी वह बस से उतरने के बाद जब आधे रास्ते तक पहुंचा ही था कि अचानक चक्कर खाकर गिर पड़ा | आधी रात को जब उसे होश आया तो उसने अपने-आप को डबल बेड में पाया |

कमरे में हल्की गुलाबी रंग की रोशनी पसरी थी| छत पर अपनी पूरी रफ्तार के साथ पंखा घूम रहा था | सामने वाली दीवार से सटे दीवान पर दो बच्चे सो रहे थे, एक छोटी बच्ची जिस बेड पर वह लेटा था उसी पर सो रही थी| दूसरी दीवार के सहारे दो कुर्सियां और एक बड़ा मेज डटा  था| कुर्सियों के ऊपर बच्चों के स्कूली बैग तो बड़े मेज के ऊपर खामोश ब्लैक एंड वाइट सलोरा टीवी पर कुछ तस्वीरें हरकत कर रही थीं | कुर्सियों के आगे मेज पर क्रोसिया से बुने सफ़ेद रंग के मेज पोस की झालरें पंखे की हवा से मानों टीवी में चल रहे चलचित्रों को देख हरकत कर रही थीं |  विक्की को कुछ समझ नहीं आ रहा था| उसे लग रहा था,  जैसे वह कोई सपना देख रहा है | बिस्तर पर लेटे-लेटे वह यह सब देख रहा था कि तभी हल्के गुलाबी रंग का सूट पहने खूबसूरत महिला दरवाज़ा खोलकर भीतर आयी और उसके सिराहने के पास बैठ गयी| उसके हाथ में पानी से भरा बड़ा कटोरा था | जैसे ही उसने कटोरे से निकाल कर भीगा रुमाल विक्की के माथे पर रखा, विक्की हडबडा कर उठ बैठा |

“लेटे रहो | तुम्हे अभी भी बुखार है|” जया ने पुनः उसे लिटाते हुए कहा|

“मैं यहाँ कैसे ? मैं तो ....|” विक्की आगे कुछ बोलता जया ने छोटे बच्चे की तरह चुप करा दिया और उसके माथे पर गीली पट्टी बदल दी|

विक्की एकटक उसे देखता रहा| इतनी सुंदर महिला उसने पहली बार अपने इतने करीब पाई|

कहने को जया तीन बच्चों की माँ थी | लेकिन उसके छरहरे बदन, लम्बी नाक, चेहरे की लालिमा, झील सी नीली आँखें, माथे पर चंद्राकर बिंदी देख विक्की मंत्रमुग्ध हो गया | क्षण भर के लिए वह भूल गया कि वह बीमार है| बच्चे गहरी नींद की आगोश में थे| टीवी में चल रहे चलचित्रों की रोशनी में जया के चेहरे की रंगत पल-पल बदल रही थी जो विक्की के कोमल मन को विचलित करने लगी |

“क्या हुआ ? पहले कभी देखा नहीं |” विक्की के माथे की पट्टी एक तरफ रख जया ने अपनी हथेली से बुखार चेक किया |

“अब बुखार उतर गया | तुम चाहो तो यहीं सो जाओ | मैं रोशनी बुझा देती हूँ |”  

“नहीं मैं अपने कमरे में जाता हूँ |” विक्की उठने लगा |

“इतने दिन तुम्हें पड़ोस में हो गए| पहली बार तुमने मुझे और इस कमरे को देखा है| क्यों मुझसे डर लगता है?” जया ने चुटकी लेते हुए कहा |

“आपसे नहीं | भाई से डर लगता है | मैं जब भी देखता हूँ वह शराब के नशे में चूर रहते हैं|” बेड से नीचे उतरते हुए विक्की ने कहा|

“अच्छा तो यह बात है| आज तो भाई दूसरे शहर गए हैं| दो-तीन दिन में लौटेंगे| अब तो डर नहीं?” जया ने सिरहाने के सहारे कमर सीधी करते हुए कहा |

विक्की धीरे-धीरे कदम बढाकर दरवाज़ा खोलकर बरामदे के बाहर खुले आँगन में चला गया| आसमान में असंख्य तारे टिमटिमा रहे थे, लेकिन चाँदनी के सुंदर आकर्षक रूप के सामने उसे बाकी सब अदने से नज़र आ रहे थे | बाहर का वातावरण बंद कमरे से ज्यादा सुकून भरा उसे लग रहा था| उधर दिन भर की थकी हारी जया की आँख लग गयी | विक्की खुले आसमान के नीचे तारों की छांव में अपने मन के मैल को धोने के लिए अपने आप से लड़ रहा था |

“बेटा ! अब कैसे है तुम्हारी तबीयत?” अचानक खिड़की के भीतर से मकान मालकिन अम्मा की आवाज विक्की के कानों में गूंजी |

“जी ठीक है... मैं तो ....|” ऐसे हडबडा कर विक्की ने कहा जैसे बूढ़ी अम्मा ने उसकी चोरी पकड़ ली हो|

“जाओ अब आराम करो| तुम चाहो तो मेरे बूढ़े के कमरे में सो सकते हो| मैं बैठक में खिड़की से सटे दीवान में सोती हूँ | वहां से बाहर क्या हो रहा है सब दिखाई देता है|” अम्मा ने अँधेरे कमरे की खिड़की के भीतर से कहा |

“नहीं मैं जाता हूँ अपने कमरे में|” जेबें टटोलते हुए विक्की ने कहा|

“चाबी खो गयी| मुझे मालूम है| ताला कल तोड़ लेना|”

“अम्मा दूसरी है| मैंने दूसरी चाबी दरवाज़े के ऊपर बने छेद में रखी है|” कहते हुए विक्की ने पंजों के सहारे चाबी निकाल ली और दरवाज़ा खुला छोड़ चुपचाप अपनी चारपाई पर लेट गया |

दफ़्तर से आते हुए रास्ते में उसके साथ क्या हुआ| वह घर कैसे पहुंचा इन सब बातों से बेखबर विक्की फिर से जया के उस मुखमंडल की अप्रतीम छवि के बसीभूत  हो गया जिसने उसके कुंठित मन में हलचल पैदा कर दी थी | उसे लग रहा था जैसे उस मुख मंडल की रोशनी कमरे के जालीदार दरवाज़े को चीरकर उसके अंधियारे मन के भीतर चहलकदमी कर रही हो| 

@विजय मधुर२८४२६  

शुक्रवार, 22 मई 2020

कविता:विडंबना


मजदूर नहीं
मजबूर हैं
शतरंज की
बिसात के
पिटते
प्यादे हैं
हार-जीत
किसी की
भी हो  
क्या फ़र्क
पड़ता है
राजा तो
राजा ही
होता है
सजा का
हकदार
तो केवल
मजबूर
होता है |
@2020 विजय मधुर
नाटक अंधेर नगरी चौपट राजा का एक दृश्य

रविवार, 10 मई 2020

कोरोना काल

१ मई १८८६ को मजदूर दिवस का आरम्भ अमेरिका से कार्य करने के आठ घंटे निर्धारित करने को लेकर हुआ था |  इस आन्दोलन में कुछ मजदूरों ने जानें गंवाई और बलिदान स्वरूप अमेरिका में मजदूरों के कार्य करने के आठ घंटे निर्धारित किये गए |  भारत में इसकी शुरुआत १ मई १८२३ में चेन्नई से आरम्भ हुई | तब से हर वर्ष संपूर्ण विश्व के साथ पूरे भारत में मजदूर दिवस मनाया जाता है | 

इस बार मजदूरों के साथ-साथ मजदूर दिवस कोरोना वायरस की भेंट चढ़ गया | असंगठित क्षेत्र के मजदूर कोरोना की गिरफ्त में ऐसे फंस गए हैं  जैसे किसी अजगर की चपेट में उसका शिकार |  मजदूर  वह धुरी है जिस पर  देश का जनजीवन और अर्थव्वस्था सुचारू रूप से चलती है | धुरी चरमरा गयी कमजोर पड़ गयी है |  फिर से अपने स्थान पर आने कार्य करने में समय कितना लगेगा प्रश्न समय के गर्त में है | 

मजदूर

जिनके बूते 
महामारी के 
इस दौर में 
घरों में अपने 
सुरक्षित हैं 
आप हम 
वह बेचारे 
भूखे प्यासे 
भटक रहे हैं 
दर ब दर 
तोड़ रहे हैं 
राह में दम |
१ मई 2020 

मनुष्य जाति अपने से ज्यादा दिमागदार किसी को नहीं समझती | देखने में कोआ एक पक्षी है | खिड़की से देख रहा हूँ कि उनके घोसले में अभी कोई हलचल नहीं | कौवी बीच - बीच में उड़ कर जाती है तो कोआ घोसले की चोकिदारी  करता है | कौवी के वापस लौटने पर ही कहीं जाता है | जनबरी माह से उनके घोसला बनाने की प्रक्रिया को देख रहा हूँ | इससे पहले स्थान चुनने में भी उन्हें समय लगा होगा | योजनावद्ध कार्य शैली क्या होती है इन पक्षियों से सीखने की जरुरत है | भले ही पक्षियों की जमात में इनका स्थान खास नहीं | फिर भी पितृ पूजा के दिन उन्हें भोग लगाने के लिए बेसबरी से ढूँढा जाता है |


आज अन्तर्राष्ट्रीय मातृ दिवस है | एक मां की साधना का प्रत्यक्ष उदाहरण है नारियल के पेड़ पर कोवी का घोसला | आये दिन तेज़ आंधी और बौछारे चलती है लेकिन वह अपने कर्तब्य से तनिक भी बिमुख नहीं होती | डटी रहती है अपना घोसला बचाने में | कल उसमें अंडे देगी .... उन अण्डों से छोटे-छोटे बच्चे निकलेगें .... अपनी चोंच पर उनके लिए चुनिन्दा दाना लायेगी ... उन्हें पाल पोस कर बढ़ा करेगी .... और जैसे ही उन बच्चों के पर निकल जायेगें ....... उड़ कर कहीं दूर चले जायेगें ..... बचे रह जायेगें डाल पर कोआ और कौवी |  यही सृष्टि का नियम भी है |

आत्मविश्वास 
दूर ही सही 

हर पल मेरे 
रहती हो पास 
हार जाता हूँ 
जब जग से 
देती असीस
बंधती आस |

 पशु - पक्षी और मनुष्य जाति में फर्क | मनुष्य जाति में मानवता .... दया धर्म .... पारिवारिक और सामाजिक जिम्मेदारियों का अहसास  होना ही चाहिए | बुद्धि विवेक और समय पर लिया गया निर्णय इंसान को महानता की ओर ले जाता है ||आडम्बर और दिखावे से नहीं |



@2020 विजय मधुर 



शनिवार, 25 अप्रैल 2020

कोरोना से डोरोना

       २८ जनबरी के अपने लेख 'किसे कहूं मन की बात' में मैंने  कोरोना की बढ़ती आशंका के प्रति अपनी चिंता व्यक्त की थी | जनबरी के पश्चात फरवरी आयी मार्च आया और अब अप्रैल माह | जल्दी ही मई का महीना आरम्भ हो जायेगा | मार्च अंतिम सप्ताह में विश्व के साथ-साथ भारत को भी कोरोना महामारी ने अपनी गिरफ्त में ले लिया | अचानक लॉकडाउन की घोषणा की गयी | जो जिस हाल में जहां था वहीं रुकने पर विवस हो गया | प्रतिस्पर्धा के दौर में खुद को ताकतवर साबित करने वाले दिग्गज बचाव की स्थिति में आ गए | विश्व अर्थव्यवस्था और विलासिता पूर्ण जीवन चार दीवारी में सिमट गया | असहाय, मजबूर, मजदूर सभी  भिखारियों की पंगत में खड़े हो गए |  अस्पताल-अस्पताल कर्मी, स्वास्थ्य-स्वास्थ्य कर्मी, सुरक्षा-सुरक्षा कर्मी और आवश्यक सेवा प्रदान करने वाले कर्मियों ने कमर कस ली छुआ-छूत की इस बीमारी से लड़ने के लिए  | लॉकडाउन हुए आज महीना बीत चुका है | जिस तरह रोजगार बिहीन लोग किस हाल में है अंदाजा लगाना नामुकिन है उसी तरह महामारी से प्रभावित आंकड़ें उन अलग-अलग  न्यूज़ चैनलों के विचारों की तरह हैं जो पल-पल बदलते रहते हैं | अभी फिलहाल ३ मई तक देश में लॉकडाउन है | राहत सामग्री, उपचार, मास्क, साफ-सफाई,  सामाजिक दूरी बनाये रखने लिए जनता  और प्रशासन मुस्तैद है | नियमों के पालन, खुद के बचाव और सावधानी में ही भला है | प्रायः  पहाड़ों में सरपट दौड़ती गाड़ियों के लिए हर मोड़ पर निर्देश देखने में आते हैं   - जैसे  गाड़ी धीरे चलायें, आगे तीव्र मोड़ है, दुर्घटना प्रभावित क्षेत्र, सावधानी हटी-दुर्घटना घटी | इन निर्देशों पालन आज हर क्षेत्र में अनिवार्य हो गया है | इसी में जनता और देश की सुरक्षा निहित है |

  • कोरोना से डरो ना  
  • छींटाकसी करो ना  
  •  दिनों-दिन बदलता  
  • है रंग आसमान     
  • जहां मिले ठिकाना   
  • कुछ दिन कैसे भी    
  • वहीँ ठहरो ना |   
        पिछले पन्द्रह दिनों से खिड़की के सामने वाले नारियल के पेड़ पर कौवा-कौवी घोसला बनाने में ब्यस्त थे | घोसला पूर्ण बन चुका है | कोवी दिन-रात अब उसमें बैठी रहती है | कौवा पेड़ के इर्द-गिर्द पहरेदारी में लगा रहता है | दूसरे पक्षियों और गिलहरियों को पेड़ के आस-पास नहीं फटकने देता | पूरी खिड़की खोल कभी मैं भी धूप और हवा का आनंद उठाना चाहूं या उनकी गतिबिधियों नज़र रखता हूँ तो कौवा मुझे घूरने लगता है |  जोर-जोर से काँव-काँव करने लगता है | मैं खिड़की बंद कर देता हूँ | कमरे की खिड़की तो बंद हो जाती है लेकिन मन की खिड़की हर पल खुली रहती है | विचार करती है चिन्तनशील रहती है सोते जागते उनके लिए, जो अपने मन की खिड़की-दरवाजों को तालों में बंद किये बैठे हैं | चिंताग्रस्त, रोगग्रस्त, अभावग्रस्त बच्चों महिलाओं बुजुर्गों की बदहाली के लिए | तिल-तिल मरते दफ़न होते युवाओं और अपनों के सपनों के लिए | 
       चार-पांच दिनों से रोज बारिश और तेज हवाएं चल रही हैं | कौवा-कौवी अपने कर्म क्षेत्र में अडिग हैं  | कोयल अपने मधुर कंठ की सुरीली आवाज से कानों में मिस्री घोलती, नयी आस जगा रही है | मेरे मन की बात आखिर किसी ने तो सुनी | व्यथित न हो सब ठीक हो जाएगा | 

@०२/2020 विजय मधुर

मंगलवार, 28 जनवरी 2020

किसे कहूं मन की बात

      पिछले कुछ दिनों  से मन बहुत परेशान है | किसके आगे अपना दुखड़ा रोऊँ | सारे लोग तो मेरी ही तरह बाहर से खुश नज़र आते हैं | भीतर की व्यथा कोई किसी की नहीं जानता | लगता है इस सृष्टि में जो जन्मा है उसे संघर्षों से जूझना ही पड़ता है | कुछ दिन पहले ही अपने कमरे की खिड़की से बाहर देख रहा था | तीव्र गति से हवाएं खिड़की के शीशे से टकरा रही थी | उतर दिशा वाली खिड़की से कुछ दूर नारियल और सुपारी के पेड़ आपस में टकरा रहे थे | जैसे ही लगता  पतले तने वाला कमजोर सा  सुपारी का पेड़ अब गिरा तब गिरा तभी नारियल का पेड़ सहारा  बन जाता  | कितनी ही बार एसा भी हुआ कि हवा ने अपना रुख बदल लिया | लेकिन ऐसी दशा में भी नारियल का पेड़ सारा दबाव अपने ऊपर ले लेता | बिजातीय होने के बाबजूद आज दोनों पेड़ खुश हैं और दोनों में उत्पति अंकुर फूटने लगे हैं | 
     जब से वहां आया हूँ सुख-दुःख के साथी यही पेड़ तो हैं जो तीसरी मंजिल के फ्लैट के  कमरे से  दोनों खिडकियों से चंद दूरी पर हैं | कई बार तो लगता है जैसे वह सुबह-शाम मानो इस प्रतीक्षा में खड़े रहते हैं कि कब खिड़कियाँ खुले और हम कमरे में बंद अपने दोस्त का दीदार करें | खिड़की खुलते ही उनमें हलचल शुरू हो जाती है एक ओर नारियल के पेड़ की नुकीली पतियाँ हल्की-हल्की लहराने लगती हैं वहीँ गर्मियों के दिनों हाथ से झलने  वाले पंखे के आकृति वाली सुपारी के पेड़ कि पत्तियां मानो मेरे परेशान चेहरे पर पंखा झल रही हों और कह रही हों मत परेशान हो मित्र ! अमावस की काली रात चाहे कितनी डरावनी क्यों न हो सुबह सूरज की स्वर्णिम किरणों के दर्शन मात्र से ही सब कुछ सुहावना लगने लगता है |

     इन दो पेड़ों के अतिरिक्त एक तीसरी प्रजाति का पेड़ है जो पूर्व दिशा में खुलने वाली खिड़की से कुछ दूर नारियल के पेड़ों से कुछ हट कर है  | उसका  स्वभाव दोनों से भिन्न है | मोर की टांगों की  तरह जमीन में टिके  दो तने और पत्तियों में चमक  | दूर से देखने पर दोनों अलग-अलग लगते हैं लेकिन हैं एक ही | लगता है वो अलग-थलग पड़ गया है | भले ही नजदीक से नहीं | कास वो अपने  मन की बात कह पाता | पिछले कई महीनों  से बारी-बारी दोनों खिडकियों से इन पेड़ों को देखता आ रहा हूँ | सुपारी के बालियों  की तरह फूल और पीले  छोटे - छोटे गुच्छे में फल  देखे, नारियल के पेड़ पर फूल फल देखे | फूलों से कीट-पतंगों को दूर भगाते उसके बड़े पत्तों को देखा | उनका सुकून और संघर्ष देखा | गिलहरियों  को दोनों पेड़ों पर सरपट दौड़ते चहल कदमी करते देखा | कागों को काँव-काँव करते देखा | लेकिन काले-सफेद तनों  वाले तीसरे पेड़ पर इन दोंनो की तरह कुछ भी नहीं देखा | लगता है कुछ तो गूढ़ रहस्य छुपा  है इसमें | वरना घनी आवादी के मध्य इतने ऊँचे भला उसे कौन उठने देता |

   बसंत ने अपनी दस्तक दे दी | जिस पेड़ को नारियल सुपारी से अलग देख रहा था उसकी घनी चमकदार पतियों के बीच छुपकर कोयल कूह ... कूह ... के मधुर स्वर में  जगाने लगी  है | लेकिन जैसे ही खिडकियां खोलता हूँ वह न जाने कहां गायब हो जाती है | नहीं चाहती कि मैं करीब से उसे कूह ... कूह... करते देखूं | कई बार दो कोयलों को बात करते भी मैं सुनता हूँ | दोनों के दरमियान फासला होता है लगभग एक मील का | एक दूर पेड़ से कुछ बोलती है तो दूसरी पास वाले पेड़ से कुछ और | कास उनकी भाषा या दूरी का रहस्य समझ पाता |

   बसंत का खुशगवार मौसम | हल्की ठंडक | गुनगुनी धूप | त्योहारों की दरवाजे पर दस्तक | प्रेमी जोड़ों की सड़कों या पुल के दोनों तरफ लगे मोटे-मोटे पाइपों के सहारे गुफ्तगू |

    देश की राजधानी दिल्ली की तरह यहाँ चौड़ी छाती वाले नहीं है |  ना ही  बड़े-बड़े बाग़ और उसमें जमा लोग | जिसका जो मन करे वह करे या बोले | कल यहां पतझड़ था आज वहां और अभी न जाने कहां-कहां बेमौसम पतझड़ आ जाए | तेज़ आंधी आ जाये |  नन्हे-नन्हे फूल, कोंपलें मय पेड़ अपनी जड़ों से कभी भी बिलग हो सकते हैं | जब पेड़ पौधे ही नहीं होंगें | शुद्ध हवा-पानी नहीं होगा | बदलते मौसम में प्रदूषण और  कोरोना वायरस का प्रकोप बढ़ने के अंदेशे से मन व्यथित  है |  किसे कहूं मन की बात |
@2020 विजय मधुर 

शनिवार, 19 अक्टूबर 2019

कविता: प्यारा शहर

स्वच्छ होगा चमन तो
खिलेंगे फूल बहारों में
इठलायेंगी तितलियां

आँगन बाग़ बगीचों में
घटाएं बिखेरेंगी खुशबू
वातावरण कर देगा
स्वतः ही धराशायी
बीमारी फ़ैलाने वाले
तमाम जंतुओं को
चाहे हों थलचर
जलचर या नभचर
ऐसे में भला 

कैसे न रहेगा
मस्त एवं स्वस्थ
हमारा अजीज़
प्यारा शहर।

@10/2019 विजय मधुर