सांय का समय था | ‘घर्र-घर्र’ की आवाज़ के साथ अहाते से कुछ दूर तिपहिया वाहन आकर रुका, मंजू ने बाहर झांककर देखा तो उसमें से विवेक उतरकर आगे बढ़ा और सीधे अपने कमरे में चला गया | थोड़ी देर बाद पुनः जब मंजू ने बाहर झाँका तो तिपहिया वाहन वहीं खड़ा देख उसका माथा ठनका-आखिर बात क्या है? सीधे विवेक के कमरे में चली गई | विवेक अपनी किताबें और कपड़े संदूक में समेट रहा था |
"क्या तुम यहां से कमरा बदलकर कहीं और जा रहे हो?" मंजू ने विवेक का हाथ पकड़ते हुए कहा |
"जी," मंजू से नज़रें बचाते हुए विवेक ने कहा |
"अचानक...? किसी ने तुम्हें कुछ कहा ?" मंजू ने पूछा |
"नहीं तो | ऑफिस के नज़दीक अच्छा कमरा मिल गया है | इससे गुज़ारा नहीं हो पा रहा था | एक खाट के अलावा इसमें जगह ही कहाँ है? गाँव से भी आये दिन कोई न कोई आता रहता है | अम्मा जी को मैंने कल ही बता दिया था | इस महीने का किराया तो पहले ही उनके पास एडवांस में है |" विवेक ने बिना मंजू की ओर देखे अपनी बात कही |
"अच्छा तो तुम पहले ही फैसला..!" कहते-कहते वह ठिठक गयी| बरामदे में ‘ठक-ठक’ बूटों की आवाज़ सुनाई दी |
बरामदे से मंजू की आवाज सुनकर विलास भी वहाँ आ पहुँचा |
"क्या हुआ, सब ठीक तो है? " विलास ने कहा |
"देख लो | यह विवेक यहाँ से कमरा बदल रहा है |" अपने आप को सँभालते हुए मंजू ने कहा |
"इसमें हम भला क्या कर सकते हैं ? इसकी मर्जी | देख लो भाई आराम से रहना और अपना ध्यान रखना | कभी भी किसी चीज़ की ज़रूरत पड़े तो अपने इस बड़े भाई को याद कर लेना |" कहते हुए उसने मंजू के कंधे में हाथ रख दिया |
"चलो, अब उसको अपना काम करने दो और हम अपना काम करते हैं | मैं तो डर ही गया था ... |" कहते हुए विलास मंजू को साथ लेकर अपने कमरे में चला गया और दरवाज़ा बंद कर भीतर से कुंडी लगा दी |
तीनों बच्चे अन्य बच्चों के साथ में खेलने गए हुए थे | अम्मा जी के कमरे से खांसने की आवाज के साथ-साथ कुछ मिली-जुली आवाजें बगल वाले कमरे से विवेक को स्पष्ट सुनाई दे रही थी |
घर का सारा सामान-जिसमें कुछ किताबें, गिने-चुने कपड़े और बर्तन थे - संदूक के भीतर समा गए | रजाई-गद्दा, तकिया और दो चादरें बिस्तरबंद में सिमट गईं | प्लाटिक की बाल्टी में मग, साबुन, ब्रश, झाड़ू, पोंछा और छोटा-मोटा सामान आ गया | जूट के थैले में स्टोव, तवा, चकला-बेलन और किचन के डिब्बे रख दिए गए | नए कमरे में दो फोल्डिंग चारपाई और नए बिस्तरों की व्यवस्था विवेक पहले कर आया था, इसलिए पुरानी खाट को वहीं छोड़ दिया | चारों नग तिपहिया वाहन में लादकर विवेक ने वापस आकर एक बार अपने उस छोटे से कमरे का निरीक्षण किया |
तब तक बगल वाले कमरे का दरवाज़ा खुल चुका था | अम्मा जी, विलास और मंजू से विदाई लेकर वह सामान के साथ चालक के बगल वाली सीट पर सवार हो गया | मंजू का सुर्ख चेहरा क्षितिज में डूबते उस लाल सूरज को एकटक निहारने लगा जो, उसकी आँखों से ओझल होने को आतुर था |
"चलो अच्छा हुआ, अपने ऑफिस के पास चला गया | उस दिन की घटना के बारे में सुनकर, मुझे उसकी चिंता होने लगी थी ," विलास ने हाथ से अपने बालों को ठीक करते हुए कहा |
वह घटना पंद्रह दिन पहले की थी | मंजू घर के ज़रूरी काम-काज निपटाने के बाद बच्चों को होमवर्क कराने बैठी ही थी कि तभी पड़ोस के महेश और रुपेश, विवेक को सहारा देते हुए दिखे | उन्हें देखते ही मंजू घबराकर बाहर की ओर दौड़ी |
“क्या हुआ विवेक को?” मंजू ने बदहवास होकर पूछा |
“भाभी जी, विवेक भेल चौक के पास बेहोश पड़ा था | आस-पास भीड़ जमा थी| वह तो अच्छा हुआ कि हमारी नज़र पड़ गई, वरना बेचारा न जाने कब तक लावारिस की तरह नाली के पास पड़ा रहता | लोग कह रहे थे कि 'शराब पीकर पड़ा है, जब होश आयेगा तो खुद ही उठ खड़ा होगा, '” पसीने से तरबतर हाँफते हुए महेश ने बताया |
“भगवान का शुक्र है जो तुमने इसे देख लिया, वरना किसी गाड़ी के नीचे आ जाता तो क्या होता?” मंजू ने विवेक को सहारा देते हुए कहा |
विवेक के कमरे पर पहुँचकर महेश ने उसकी पैंट-कमीज़ की जेबें टटोलीं, लेकिन कमरे की चाबी नहीं मिली | शायद रास्ते में कहीं गिर गई थी |
“अब क्या करें ?” महेश ने मंजू की ओर देखते हुए पूछा |
“यही ठीक रहेगा | चलो हमारे कमरे में ही सुला देते हैं | जब इसे होश आ जायेगा, तब ताला तोड़ देंगें,” मंजू ने उसे अपने कमरे की ओर ले जाते हुए कहा | महेश और रूपेश ने भी सहमति में सिर हिलाया |
मंजू और विवेक के कमरे एक ही बंद बरामदे के भीतर थे | बरामदे के सामने पूरी जाली और बीच में एक जालीदार गेट था | उसी बरामदे के एक छोर पर मंजू की रसोई सजी रहती थी | विवेक की धुंधली आँखे शून्य में ताक रही थीं और शरीर महेश और रुपेश के सहारे बेदम सा आगे बढ़ रहा था |विवेक की हालत देख मंजू के तीनों बच्चे होमवर्क छोड़कर सहम गए | उनकी कॉपी-किताबें डबल बेड पर बिखरी पड़ी थीं | मंजू ने बच्चों का सामान समेटा, विवेक के जूते-मोज़े उतारे और धूल से सने उसके कपड़ो को अपने दुपट्टे से झाड़ दिया | फिर सबने मिलकर विवेक को दीवान पर लेटा दिया | कमरे की ठंडक और बिस्तर मिलते ही विवेक जैसे गहरी नींद में डूब गया |
"भाभी जी, कोई ज़रूरत हो तो बुला लेना | फ़िक्र मत करना |" काफी देर इंतज़ार करने के बाद महेश और रुपेश विदा हुए |
रात काफी हो चुकी थी | बरामदे के ठीक सामने रहने वाली बूढ़ी अम्मा भी कई चक्कर काटकर सोने चली गयी थीं | बच्चे खाना खाकर सो चुके थे; लेकिन विवेक की चिंता में मंजू की आँखों से नींद कोसों दूर थी | विवेक का शरीर बुखार से तप रहा था | वह बेहोशी में बार-बार पुकार रहा था-
“माँ .... माँ .... कहाँ हो तुम .... मुझे अकेला मत छोड़ना!”
शहर आने के एक साल बाद ही विवेक की सरकारी नौकरी लग गयी थी, लेकिन परिवार से अलग अकेला रहने का दर्द क्या होता है, यह उसे अब समझ आ रहा था | गाँव में भरा-पूरा परिवार, शुद्ध आब-ओ-हवा, बड़ा घर, खुला आँगन, खेत-खलिहान, धारे-पंदेरे, नदियाँ, जंगल, पशु-पक्षी, संगी-साथी और नाते-रिश्तेदार - सब कुछ तो उसके पास मौजूद था | लेकिन यहाँ, परिवार से अलग-थलग वह अपने-आप को बहुत अकेला महसूस करता था | सुबह खाली पेट ऑफिस जाता और चाय नाश्ता व दिन का भोजन अक्सर ऑफिस की कैंटीन में ही कर लिया करता | रात को मन होता, तो गाँव से साथ लाये स्टोव पर, गिनती के चार बर्तनों में से किसी एक में खिचड़ी पका लेता था |
गाँव से शहर आये विवेक को डेढ़ साल होने को थे, लेकिन वह अपने-आप को शहरी परिवेश में नहीं ढाल पाया था | लोगों का बनावटीपन, कथनी-करनी का भेद और बोल-चाल का लहजा उसकी समझ से परे था | इसलिए बीस साल की उम्र में ही जितना हो सके, चुप रहना सीख लिया था |
कमरे से विवेक का दफ्तर आठ किलोमीटर दूर था | गाँधी चौक तक पहले चार किलोमीटर उसे पैदल चलना पड़ता और फिर वहां से अगले चार किलोमीटर नगर बस से वह दफ़्तर पहुँचता था | वापसी में पहले नगर बस और बाकी रास्ता वह पैदल ही नापता था | इसलिए वह सुबह जल्दी निकल जाता और देर शाम को कमरे में लौटता था | आज भी बस से उतरने के बाद जब वह आधे रास्ते पहुंचा ही था कि अचानक चक्कर खाकर गिर पड़ा | आधी रात को जब उसे होश आया, तो उसने खुद को एक मखमली बिस्तर पर पाया |
कमरे में हल्की गुलाबी रोशनी पसरी थी| छत पर पंखा अपनी पूरी रफ्तार के साथ घूम रहा था | सामने वाले डबल बेड पर मंजू के तीनों बच्चे - दो लड़के और एक लड़की- गहरी नींद में सोए थे | तीसरी दीवार के सहारे दो कुर्सियां और एक बड़ा मेज़ डटा था | कुर्सियों पर बच्चों के स्कूली बैग रखे थे, तो बड़े मेज के ऊपर खामोश ‘सलोरा’ ब्लैक एंड व्हाइट टीवी की स्क्रीन पर कुछ आकृतियाँ हरकत कर रही थीं | सेंटर टेबल पर बिछे क्रोशिए से बुने सफ़ेद मेजपोश की झालरें पंखे की हवा से मानों टीवी के चलचित्रों के ताल पर करतब दिखाने में अभ्यस्त थीं |
दरवाज़े के ठीक ऊपर टंगी दीवार घड़ी में रात पौने एक का समय हो रहा था | विवेक को कुछ समझ नहीं आ रहा था; उसे लग रहा था जैसे वह कोई सपना देख रहा है | वह बिस्तर पर लेटे-लेटे यह सब देख ही रहा था कि अचानक हल्के गुलाबी रंग का सूट पहने एक युवती कमरे का जालीदार दरवाज़ा खोलकर भीतर आई और उसके सिराहने बैठ गयी | उसके हाथ में पानी से भरा बड़ा कटोरा था | जैसे ही उसने कटोरे से भीगा रुमाल निकालकर विवेक के माथे पर रखा, विवेक हड़बड़ाकर उठ बैठा |
“लेटे रहो | तुम्हे अभी बुखार है |” मंजू ने उसे लेटने का इशारा करते हुए कहा |
“मैं यहाँ कैसे? मैं तो ....!” विवेक आगे कुछ बोल पाता, उससे पहले ही मंजू ने किसी छोटे बच्चे की तरह उसे चुप करा दिया और उसके माथे की पट्टी बदल दी |
विवेक एकटक मंजू को निहारता रहा | उसे इस कमरे में आये छह महीने हो गए थे, लेकिन उसने कभी मंजू को करीब से ठीक से नहीं देखा था | जबकि उसे अपने कमरे में जाने के लिए उसे मंजू की रसोई के एकदम पास से गुज़रना पड़ता था | कई बार तो उसे रास्ता देने के लिए मंजू को खुद खिसकना पड़ता था | तब विवेक दूर से ही उसे ‘नमस्ते’ कर अपने कमरे में दुबक जाता और किताबों में सिमट जाता था | छुट्टी के दिन भी वह सुबह ही कहीं घूमने निकल जाता और देर रात ही घर लौटता था |
मंजू के माता-पिता की आर्थिक स्थिति ठीक न थी, इसलिए उन्होंने उसे पढ़ाने के बजाय पंद्रह साल की उम्र में ही, उससे लगभग दुगनी उम्र के सरकारी कर्मचारी विलास के साथ उसके हाथ पीले कर दिए | विलास के लिए नशे की हालत में घर आकर गाली-गलौज और मार-पीट करना आम बात थी | इक्कीस वर्ष की उम्र तक पहुँचते-पहुँचते मंजू तीन बच्चों की माँ बन चुकी थी |
मंजू भले ही विवेक से छः साल बड़ी और तीन बच्चों की माँ थी, लेकिन पहली बार अपने इतने समीप किसी सुंदर युवती को पाया था | बक्त की मार से भले ही मंजू का चेहरा मुरझाया हुआ था, लेकिन उसके छरहरे बदन, लम्बी नाक, गोल चेहरा और हिरनी जैसी आँखें देख विवेक मंत्रमुग्ध हुए बगैर न रह सका | माथे पर सजी चंद्राकर बिंदी उसकी सुंदरता में चार चाँद लगा रही थी | क्षण भर के लिए वह भूल गया कि वह बीमार है | दिन भर घर में उछल-कूद करने वाले बच्चे ‘घोड़े बेच कर सो रहे थे’ | टीवी के चलचित्रों की बदलती रोशनी मंजू के चेहरे के रंग पल-पल बदल रही थी, जो विवेक के मन को और अधिक विचलित करने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ रही थी |
“क्या हुआ? इतने ध्यान से क्या देख रहे हो? पहले कभी देखा नहीं क्या?” माथे की पट्टी एक तरफ रख मंजू ने अपनी हथेली से बुखार परखा |
“अब बुखार उतर गया | अब तुम आराम से सो जाओ, मैं रोशनी बुझा देती हूँ |”
“नहीं, मैं अपने कमरे में जाता हूँ,” विवेक ने उठने कोशिश करते हुए कहा |
“इतने दिन तुम्हें पड़ोस में हो गए हैं | चलो, किसी बहाने ही सही, तुमने हमारे कमरे का दीदार तो किया | क्यों, हमसे डर लगता है क्या?” मंजू ने चुटकी लेते हुए कहा |
“आपसे नहीं | भाई से डर लगता है | मैं जब भी उन्हें देखता हूँ, वह शराब के नशे में चूर रहते हैं |” दीवान से उतरकर फर्श पर कदम रखते हुए विवेक ने कहा |
“अच्छा तो यह बात है! आज तो भाई दूसरे शहर गए हैं, दो-तीन दिन में लौटेंगे | अब तो डर नहीं ?” मंजू ने मुस्कुराते हुए कहा और पलंग पर सोई बेटी को थोड़ा आगे खिसकाकर सिरहाने से कमर टिका ली|
विवेक धीरे-धीरे कदम बढाकर कमरे और बरामदे का जालीदार दरवाज़ा खोलकर बाहर निकल गया | शौचालय से होकर वह अहाते में टहलने लगा | आसमान में असंख्य तारे टिमटिमा रहे थे, लेकिन चाँदनी के आकर्षक रूप के सामने बाकी सब धुंधले नज़र आ रहे थे | बाहर का वातावरण उसे बंद कमरे से ज़्यादा सुकून भरा लग रहा था | उधर दिन भर की थकी हारी मंजू की आँख लग गई थी, जो भीतर हल्के उजाले के कारण विवेक को साफ़ दिखाई दे रही थी | वह खुले आसमान के नीचे तारों की छांव में अपने मन के मैल को धोने भरसक प्रयास कर रहा था - 'जिसने विपति में साथ दिया, उसी के प्रति ऐसी सोच? छी..छी ..!'
“बेटा ! अब कैसे है तुम्हारी तबीयत?” अचानक खिड़की के पीछे से मकान मालकिन अम्मा की आवाज़ विवेक के कानों में गूंजी |
“जी ठीक है... मैं तो ....!” विवेक ने ऐसे हड़बड़ाकर बोला जैसे बूढ़ी अम्मा ने उसके मन के चोर को पकड़ लिया हो|
“जाओ! अब आराम करो | तुम चाहो तो मेरे दिवंगत पति के कमरे में सो सकते हो | मैं बैठक में खिड़की से सटे दीवान पर सोती हूँ | यहां सामने क्या चल रहा है, सब दिखाई देता है, और विपत्ति की घड़ी में किसी को पुकार सकूं |” अम्मा ने अँधेरे कमरे की खिड़की के भीतर से कहा |
“नहीं अम्मा, अभी अपने कमरे में जाता हूँ |” जेबें टटोलते हुए विवेक ने कहा |
“चाबी खो गयी है, | मुझे मालूम है | ताला कल तोड़ लेना|”
“अम्मा मेरे पास दूसरी चाबी है | मैंने दरवाज़े के ऊपर बने गौरैया के घोंसले में छुपाकर रखी है” कहते हुए विवेक ने पंजों के बल उछलकर चाबी निकाली और दरवाज़ा खोलकर चुपचाप अपनी खाट पर लेट गया |
दफ़्तर से आते हुए रास्ते में उसके साथ क्या हुआ और वह घर कैसे घर पहुँचा, इन सब बातों से बेखबर विवेक फिर से मंजू के उस मुखमंडल की अप्रतिम छवि के वशीभूत हो गया, जिसने उसके कुंठित मन में अजीब सी उथल-पुथल मचा दी थी | उसे लग रहा था मानो मंजू के चेहरे की आभा कमरे के जालीदार दरवाज़े को चीरकर उसके मन के अंधियारे को आलोकित कर रही हो | अब उसकी आँखों से नींद गायब हो चुकी थी | एक बार फिर से शौचालय से आते हुए उसने बरामदे से बगल वाले कमरे के भीतर झांका, मंजू अपने तीनों बच्चों के साथ इत्मीनान के साथ सो रही थी | दीवान खाली पड़ा था - शायद मंजू ने सोचा होगा कि विवेक उस पर सोयेगा | उसे अंदाज़ा नहीं था कि विवेक के पास दूसरी चाबी भी है | तभी सामने की बंद खिड़की से अम्मा की खांसी की आवाज़ आई और विवेक सकपकाकर अपने कमरे में लौट गया |
अगले दिन देर से जागने और उसके अगले दिन रविवार का अवकाश होने के कारण विवेक को घर में ही आराम करना पड़ा | इन दो दिनों में मंजू ने सुबह चाय से लेकर रात को खाने तक विवेक को कोई कष्ट नहीं होने दिया | मंजू को जब भी अपने काम से फुर्सत मिलती, वह विवेक के पास चली जाती थी और देर तक अपना सुख-दुःख साझा करती | बुरे समय को याद कर वह कभी-कभी फफक-फफक कर रोने लगती | उसे चुप कराना विवेक के लिए बहुत असहज हो जाता था |
इधर, अम्मा को उनकी नजदीकियाँ खलने लगी थीं और उनकी नजरें पैनी हो गयी थीं | जब भी वह दोनों के पास से गुज़रतीं, कृत्रिम रूप से खांसने लगती थी | पूरे मोहल्ले में अफ़वाह फैलने में देर नहीं लगी |
"विवेक भाई! सुना है आजकल तुम खूब मौज काट रहे हो |" ऑफिस जाते समय एक दिन रुपेश ने चुटकी ली |
"कैसी मौज?" विवेक ने अनभिज्ञ बनते हुए पूछा |
"बनाओ मत | हमें सब पता है | बीमारी का पूरा फ़ायदा उठाया है तुमने |" महेश ने व्यंग्य किया |
"अभी ऑफिस की देर हो रही है | शाम को मिलता हूँ |" कहकर विवेक तेज़ी से निकल गया, पर उसके कान अब भी उन कड़वी बातों से जल रहे थे |
महेश और रुपेश के अहसानों के कारण विवेक को उनसे बहस करना उचित न लगा | हालाँकि, मंजू और उसके परिवार का सानिध्य पाकर विवेक का उदास मन प्रसन्न रहने लगा था | समय मिलने पर बच्चे विवेक के पास अपने गणित और विज्ञान के सवाल लेकर आने लगे - 'अंकल, यह प्रश्न कैसे हल होगा?' | विलास भी आते-जाते हाल-समाचार पूछ लिया करता, 'कैसे को विवेक?'
विवेक की झलक पाते ही मंजू का मुरझाया हुआ चेहरा खिल उठता था | शायद यही निस्वार्थ खुशियाँ लोगों की आँखों में खटकने लगी थीं | मोहल्ले की कानाफूसी और अपनों के बदलते लहजे ने विवेक को भीतर तक झकझोर दिया था | इसलिए, न चाहते हुए भी उसने वहां से कमरा छोड़कर जाने में ही अपनी और उसकी भलाई समझी |
तिपहिया वाहन अब अहाते से बाहर निकल चुका था। विवेक
ने पीछे मुड़कर नहीं देखा, पर उसे पता था कि एक खिड़की अब भी खुली होगी यही
तो दुनिया का दस्तूर है — ‘उससे न तो किसी का दुख देखा जाता है,
न ही किसी की खुशी |’
@विजय मधुर२८४२६