शुक्रवार, 15 मई 2026

गढ़वाली कहानी : द्वी महाराज

      रूड़़यूं का दिन व्य्खुनी को टैम, बिगरू गुठ्यार का किनर उख्र्यळ का नजीक छांटी-छांटी सुखीं पूळयूं बटी मुंगरा न जौ निकळणु छाइ । तबी अमलानंद अर गमलानंद नौ का द्वी महाराज गुठ्यार मा आ धमकीं ।

भक्तू की सदनी जय हो।” द्वियोंल एक दगड़ी जयकार लगै ।

बाबा प्रणाम!” मुंगरा तैं एक तरफां चुलैकी बिगरू द्वियों का खुटों मा नतमश्तक ह्वेगे ।

बाबों को आकर्षक डील-डौल अर मुख पर चल्क्वार देखि बिगरू मंत्रमुग्ध ह्वेगे । याँ से पैली इनमेसी का बाबा वेन कबि नि देखा छा। रेशमी धोती-कुर्ता, सफेद दाड़ी, कान्धुंद कीमती झ्व्ळा, गालुन्द राम नाम को दुसल्ला । नौन्यालू की बेरोजगारी अर ब्योबंद से लेकी परेशान बिगरू तै वो दुया देबदूत से कम नि लगणा छा ।

सड़की बटी गौं को पैलू घौर बिगरु को ही प्वड़दोु छा । गुठ्यार की दिवली मा वूंका वास्ता फौजी काळू कमळू अर वैक एंच नयु-नयु चदरु बिछऐगे अर भुयाॅं मा लोखु का वास्ता ग्रौंड सीट । बिगरू की घरवळी सूमा फटा-फट द्वी गिलास पाणी लेकी आग्ये । गौंका मर्द, ब्य्ठुला, नौना-बाळा बाबों का दर्शन कैरी अफुतैं धन्य मनण लगें । इना सज्यां-धज्यां लाल सुर्ख बाबा पैली धों गौं वलों न देखिन ।

बाबा जी! चा बणवंदया एक-एक कुळा ?” बिगरू न हाथ जोड़ी पूछी ।

हाँ, हम अपणा भक्तू की इच्छा को पूरु मान कर्द्यान । दूध मा पत्ती डाली जरा टपटिपि !” ठुला बाबा अमलानंद न सूमा का तरफ देखि बोली ।

जरुर! जा बिरजू की ब्वे, आज भगवान का रूप मा बाबों का चरण हमर घौर मा पोड़़ीन । धन्य ह्वेग्यों हम । मी तैं इनों लगणू अब हमरी सब्य चिंता-फिकर दूर ह्वे जाली ।” बिगरू न बाबों का तरफ हथ जोड़ी बोली ।

बाबों न अपण हथ आशीर्वाद का रूप मा ऐंच करी देन । अभी बाबा बैठा ही छा कि अपणु भाग दिखाण वळों की लंग्यात लगिगे ।

महाराज जरा हमर ये छ्वारा को हथ देखि बतावा, ऐकी नौकरी किलै नि लगणी हवेली ? द्वी दफा अग्निवीर की परीक्षा पास कैरी याली पण आखिरी धां झणी क्य मेस बिग्ड़द अड्खी जान्द बिचरू । तीन दफा हौरी परीक्षा देनी त वूंका पेपर लीक होण का वजै से परीक्षा रद्द ह्वेगीं । ठ्य्कादार की मेहरबानी से बड़ा साहब का कोठी मा लग त वख बटी भि निकाल दे, जोग ही खराब च। अब त नौकरी की उम्र भि जाण वली च।” श्यामू न हथ जोड़ी बाबा अमलानंद का खुटों मा सिर झुकैई दे।

बच्चा! एकी ग्रह चाल उल्टी दिशा मा चलणी । दिशा बदलण का वास्ता उपाय करण प्वाड़्लू, लगी जाली नौकरी । थोड़ा खर्च लगलू ।”  बाबा अमलानंद न लम्बी सांस लेकी बोली ।

खर्चा की फिकर नि कारा बाबा। मि आज ही एक खस्सी ब्वगठ्या बिकै देन्दु । बस तुम एकु भलु कैरी दियां । मी तुमरू अहसान जिन्दगी भर नि भुलुलू ।” अपना आंसू फुंजद-फुंजद श्यामू को गला रूंधगे ।

भोल सुबेर पांच बजी एतैं लेकी आ जयां ।” बाबा अमलानंद जी न सुरजू का मुंड पर हथ फेरी ।

महाराज ! म्यारा ये ज्याठ नौना को टिपड़ा मिलणा का बाद भि ब्यो को संजोग नि होणु । हम भौत परेशान छौं । एका पिछने तीन-तीन हौरी लग्याँ छन लंग्यात मा ।” रामू न बाबा गमलानंद से पूछी ।

राती सेण से पैली सब्यों का मुंड मथि साफ रुमाल मा एक मुठी चैंळ, एक मुठी साबुत उड़दी की दाळ, एक गाँठ हळदी अर पांच सौ एक रुपए परोखी सुबेर मैमू दे दियां । जल्दी हवे जालू सब्यों को ब्यो ।” बाबा गमलानंद न रामू की पीठ थप-थपै ।

महाराज ! म्यार नौना कु ब्यो हुन्या सात साल ह्वेगें । पोती-पोता कु मुख द्यखणा को तरसी ग्यूं हम । कत्गा उपै कैरी यलीं, सब व्यर्थ । अब आपकू ही सहारु च ।” बल्लू न बाबा गमलानंद का खुटा पखड़िनी ।

यांका वास्ता एकांत मा बात करण प्वाड़ली । भोल शाम का टैम आ जयां द्वियो तैं लेकी ।” बाबा गमलानंद न अपनी सफेद दाड़ी सहलांद-सह्लांद बोली ।

महराज तीन साल ह्वेगेन । हमारा नौना-बाला सुध लेणु बी नि आणा छन । आप ही देखि ल्यावा हम बूड-बुड्यों को यीं बुढ़ापा मा कना कुदिन होणा छन।” द्विया बूड-बुड्या बाबा गमलानंद का खुटों पोडिगें ।

उठा! यो सब माया-मोह अर कर्मग्त्यूं खेल छन। भगवान् राम को ध्यान कारा सुबेर-शाम ।” बोलदा-बोलदा छ्वटा बाबा न एक रुद्राक्ष वूंका हथ मा थमा दे ।

चा औन्द-औंद तक बाबों न सात-आठ लोखु तैं वूंकी परेशानी को हल बतला दे । ए ही दौरान द्वियों का वास्ता बिगरू न भितर ढकण-डिसाण अर खाण-पीणा व्यवस्था कैरी दे। वे तैं पता छा कि बाबा लोग घाम अछाण का बाद भोजन नि करदा। द्विया बाबा हथ-खुटा ध्वेकी भितर जाण बैठीं गेन ।

भक्तो ! अब हमरु ध्यान-धारणा को टैम हवेगे। भोल सुबेर भेंट होली। तुम्तैं भजन सुणादा पण आज हम भौत थकी गयों । जब तैं ये गौं का हरेक भक्त की परेशानी को हल नि खोजी द्यूला अग्नै नि बढ़ला । येही वास्ता हमरा महान सिद्धिपुरुष महाराज अमलानंद जी न अमलानाथ बटी यखकु रुख कैरी । सबय ब्वाला अमालानंद महाराज की ... जय ।” जयकारा लगांद-लगांद बाबा गमलानंद ठुला महाराज अमलानंद का खुटों मा दंडवत ह्वेगे ।

द्विया बाबा भितर चली गेन अर जयकारा लगांद-लगांद सब्य लोग अपणा-अपणा घौर चली गेन । गौं का दाना-सेणा बिगरू का घौर से लगदा पंचू का घौर मा तमखू पैण को इंतजाम मा बैठ गेन । मौका देखी बिगरू बी वखी चलीगे । तमखू की तलब वे तैं बी भौत लगीं छ ।

सूण भुला बिगरू ! आज त क्वी बात नी, तिन बाबों तै अपणा घौर आसरा दे दे । भोळ बटी यूंका रैण, चा-पाणी, नाश्ता अर भोजन की व्यवस्था पंचेती-घर मा कैरी दिंदा ।” गौं का सेठ जी न हुक्का थामी अपणी बात रखी ।

बात बिलकुल कैदा की बोली तुमन सेठ जी ।” सिपाल न खंस्दा खंस्दा सेठ जी की बात को समर्थन कैरी ।

भौत बढ़िया । वख कुर्सी, दरी, हारमोनियम, ढोलक, चिमटा सब्य धाणी छन ।” ढोलकी को सल्ली जैपु न अपना द्विया जान्घु पर थाप देकी बोली ।

जन आप लोखु की इच्छा ।” तमखू की सोड़ मरण का बाद बिगरू न जबाब दे ।

बिगरू की घरवाळी, चर्य अणविवाख नौना-नौनी बाबों की सेवा-भाव मा जुटयां छा ।

एक सप्ताह गौं माँ रौण का दौरान, सुबेरे बटी व्य्खुनी तक द्विया बाबों न लोखु का हथ अर माथा की लकीर अपना हिसाब से पढीं । एवज मा आम दक्षिणा - सौ रुपया से लेकी पांच सौ रुपया । कै-कै न त हजारों रूप्या खर्च कैरी देनी । प्रसाद का रूप मा एक-एक रुद्राक्ष की दाणी पैकी गौं वला अफुतैन धन्य समझणा छा । बाबों का अगनै फल-फ्रूट, घी-दूध-दही बावन व्य्न्जनु को भोग अर चढ़ावा । दिन मा आमदनी अर रंगत, राती गमत । बाबा मस्त, सेवा भक्ति अर बाबों की शान्यूं मा नचदा गौं वला पस्त। आपस मा लड़़दा-झगड़़दा गौं को माहौल ये दौरान भक्तिमय ह्वेगे ।

गौं वलों तैं पक्को यकीन ह्वेगे बाबों का आशीर्वाद रूप मा वूं तैं मिलीं रुद्राक्ष, अब वूंकी सरी खैरी-विपदा हैरी दयाली जनकि - बिना डाक्टरी इलाज का रोग कटी जाला, अणविवाख नौना-नौंन्यूं की जमात कम हवे जाली, इस्कोल मा लग्याँ ताळा खुली जाला, बढ्दी बेरोजगारी की वजै से नशाखोरी का गिरफ्त मा जान्द नौन्याळू की संख्या घटी जाली, ढक्यां कूड़यूं का द्वार खुली जाला, बंज्या पुंगड़ा चलदा हवे जाला, गौं-गाळों पसरयाँ स्यू-बाघ बोण लौटी जाला । गौं मा फिर से तीस साल पैली जनि रौनक बौडी जाली।

क्यांखु तैं प्वणयाँ तुम लोग, यूं बाबा लोगु का फेर मा । ये त सकल से ही छट्याँ लग्दन । ब्याळी आंद दफी एक झलक मा ही पछ्याण याला छ मिन वूंका रंग-ढंग । भरवंसा का काबिल नि छन कतैई । अपणा भला का सिवै ये कैकु भलु नि कैरी सकदा ।” फौज बटी छटुटी अयां एजुकेशन हवलदार अमरू न राती गमत बटी लौटदै अपणी माँ अर घरवळी समझै । 

बात गुठ्यार का रास्ता अपणा घौर जांदी बोडी का कन्दूड पोड़गे ।

सुबेर होण से पैली द्विया बाबा जन अचंणचकी गौं मा पैदा हवे छा तनी जम्पत हवेगीं । बाबों को जाणु लोखु तैं भौत अखिरी । वो अपना आपस मा बोलणा छ, ‘साधु का वेश मा साक्षात् भगवान का रूप अर अंतर्यामी छा बाबा ।’ दुफरा बाद पूरा इलाका का दगड़े-दगड गौं मा इनो सूड-बथों अर ढांडू पोड़़ी कि डाळ-बोटों मा लग्याँ फल-फूल त क्य फौंकों अर पत्तों को बी भुयां लमडीसाण लगीगे । लोखु की आशंका यकीन मा बदलिगे । ‘जरुर यो अमरु की कारिस्तानी को फल च, जैकी सजा सब्यों तै मिलणी च ।’ सरी गौं मा वेकी थू-थू ह्वेगे । सम्भल्दा-सम्भल्दा भि बिगरू की बचीं जौ की पूळी अर बूखु बथों मा उड़िगे । बचिगे त खाली गुठ्यारा का एक छोड़ पर दीवली का सार खड़ू मुंगरु ।

@विजय मधुर१५५२६ 

मंगलवार, 28 अप्रैल 2026

कहानी - एक दीवार का फ़ासला

गलियों की भीड़-भाड़ को चीरता हुआ ‘घर्र-घर्र’ की आवाज़ के साथ मोहल्ले की एकमात्र कोठी के अहाते से कुछ दूर तिपहिया वाहन आकर रुका, मंजू ने देखा, विवेक उतरकर आगे बढ़ा और सीधे अपने कमरे में चला गया | कुछ देर से तिपहिया वाहन वहीं खड़ा देख उसका माथा ठनका-आखिर बात क्या है? मामला जानने के लिए वह विवेक के कमरे में दाख़िल हुई | विवेक अपनी किताबें और कपड़े संदूक में समेट रहा था 

 "क्या तुम यहाँ से कमरा बदलकर कहीं और जा रहे हो?" मंजू ने विवेक का हाथ पकड़ते हुए कहा |

 "जी," मंजू से नज़रें बचाते हुए विवेक ने कहा |

            "अचानक...?  क्या किसी ने तुम्हें  कुछ कहा ?" मंजू ने पूछा |

            "नहीं तो | ऑफिस के पास कमरा मिल गया है | इससे गुज़ारा नहीं हो पा रहा था, एक खाट के अलावा इसमें जगह ही कहाँ बचती है? गाँव से भी कोई न कोई आता ही रहता है | अम्मा जी को मैंने कल ही बता दिया था | इस महीने का किराया उनके पास एडवांस है |" सामान समेटते हुए विवेक ने मंजू की ओर देखे बिना अपनी बात कही |

"अच्छा तो तुम पहले ही फैसला!" कहते-कहते बरामदे में ‘टक-टक’ बूटों की आवाज़ सुनकर वह ठिठक गयी |

विवेक के कमरे से मंजू की आवाज सुनकर विलास भी वहाँ आ पहुँचा

            "क्या हुआसब ठीक तो है?" विलास ने दोनों की ओर देखते हुए पूछा |

 "देख लो, यह विवेक यहाँ से कमरा बदल रहा है हमें बताना भी इसने उचित नहीं समझा |" अपने आप को सँभालते हुए मंजू ने कहा |

"इसमें भला हम क्या कर सकते हैं? उसकी मर्जी | देख लो भाई जहाँ भी रहो मस्त रहो | अपना ध्यान रखना | कभी किसी चीज़ की ज़रूरत पड़े तो अपने इस भाई को याद कर लेना |" कहते हुए उसने दोनों हाथों से मंजू के कंधे दबा दिए | बेचारी झेंप गयी |

"मैं तो डर ही गया था | चलो, अब इसको अपना काम करने दो और हम, अपना काम करते हैं |" लड़खड़ाते हुए विलास मंजू को अपने साथ ले गया और दरवाज़ा बंद कर भीतर से कुंडी लगा दी

तीनों बच्चे अन्य बच्चों के साथ कोठी के चारों ओर फैले अमरूद के बाग़ में चहल-कदमी कर रहे थे, जो विवेक की खिड़की से साफ नज़र आ रहे थे | अम्मा जी के कमरे से खांसने की आवाज़, तो बगल वाले कमरे से कुछ मिली-जुली आवाज़ें विवेक के कानों से टकरा रही थीं  | 

घर का सारा सामान-जिसमें कुछ किताबें, गिने-चुने कपड़े और बर्तन थे -  संदूक के भीतर समा गए | रजाई-गद्दा, तकिया और दो चादरें  बिस्तरबंद में सिमट गईं | प्लास्टिक की बाल्टी में मग, साबुन, ब्रश, झाड़ू, पोंछा और छोटा-मोटा सामान आ गया | जूट के थैले में स्टोव, तवा, चकला-बेलन और किचन के डिब्बे रख दिए गए | नए कमरे में दो फोल्डिंग चारपाई और नए बिस्तरों की व्यवस्था विवेक पहले ही कर आया था, इसलिए पुरानी खाट को वहीं छोड़ दिया | चारों नग तिपहिया वाहन में लादकर विवेक ने वापस आकर अपने उस छोटे से कमरे का आख़िरी बार निरीक्षण किया |

तब तक बगल वाले कमरे का दरवाज़ा खुल चुका था | अम्मा जी, विलास और मंजू से विदाई लेकर सामान के साथ विवेक चालक के बगल वाली सीट पर सवार हो गया | अम्मा जी के चेहरे पर संतोष के भाव तो मंजू का सुर्ख चेहरा तेज़ी से क्षितिज के उस पार जाते लाल सूरज को एकटक निहारने लगा, जो उसकी आँखों से ओझल होने को आतुर था

"चलो अच्छा हुआ, अपने ऑफिस के पास चला गया | उस दिन की घटना के बारे में सुनकर, मुझे उसकी चिंता होने लगी थी," विलास ने अपने दाएं हाथ की उँगलियों से छितरे बालों को ठीक करते हुए कहा |

वह घटना पंद्रह दिन पहले की थी | मंजू  घर के ज़रूरी काम-काज निपटाने के बाद बच्चों को होमवर्क कराने बैठी ही थी कि तभी पड़ोस के महेश और रुपेश, विवेक को सहारा देते हुए दिखे | उन्हें देखते ही मंजू घबराकर बाहर की ओर दौड़ी |

“क्या हुआ विवेक को?” मंजू ने बदहवास होकर पूछा |

“भाभी जी, विवेक भेल चौक के पास बेहोश पड़ा था | आस-पास भीड़ जमा थी | वह तो अच्छा हुआ कि हमारी नज़र पड़ गई, वरना बेचारा न जाने कब तक लावारिस की तरह नाली के पास पड़ा रहता | लोग कह रहे थे कि 'शराब पीकर पड़ा है, जब होश आयेगा तो खुद ही उठ खड़ा होगा,' ” पसीने से तरबतर हाँफते हुए महेश ने बताया |

“भगवान का शुक्र है जो तुमने देख लिया, वरना न जाने क्या होता ? किसी गाड़ी के नीचे आ जाता तो ?” मंजू ने विवेक को सहारा देते हुए कहा |

 विवेक के कमरे पर पहुँचकर महेश ने उसकी  पैंट-कमीज़ की जेबें टटोलीं, लेकिन कमरे की चाबी नहीं मिली | शायद रास्ते में कहीं गिर गई थी |

“अब क्या करें ?” महेश ने मंजू की ओर देखते हुए पूछा |

चलो, हमारे कमरे में सुला देते हैं | जब इसे होश आ जायेगा, तब की तब देख लेगें |मंजू ने उसे अपने कमरे की ओर ले जाते हुए कहा

"यही ठीक रहेगा |" रूपेश ने अपनी सहमति व्यक्त करते हुए  कहा  |

दोनों के कमरे एक ही बंद बरामदे के भीतर थे | बरामदे के सामने पूरी जाली और बीच में जालीदार गेट था | उसी बरामदे के एक छोर पर मंजू की रसोई सजी रहती थी | बरामदे के आगे खुले लेकिन चारों ओर से बंद अहाते के बीचों-बीच बनें सुंदर चबूतरे में हमेशा रंग-बिरंगे गुलाब के फूल वातावरण में अपनी खुशबू बिखेरते रहते थे | चबूतरे के सामने ही कोठी का पिछला दरवाज़ा खुलता था, मुख्य दरवाज़ा दूसरी ओर था, जो अक्सर बंद ही रहता था | मुख्य दरवाज़े से लगभग पचास मीटर दूर लोहे के छोटे गेट से अहाते में रहने वाले किरायेदारों का आना-जाना होता था | 

उस विशाल कोठी में अब अकेली बूढ़ी अम्मा रहती थीं | अम्मा जी के पति और पुत्र दोनों ही इस दुनिया में नहीं थे | बहू और पोता-पोतियाँ विदेशी होकर रह गए थे | अम्मा जी ने अपने छोटे-मोटे खर्चे और अकेलापन दूर करने के मकसद से वह कमरे भाड़े में दे दिए, जिनमें कभी उनकी कोठी में काम करने वाले कारिंदे रहते थे |जिनमें से छोटी कोठरी में विवेक तो बड़े कमरे में मंजू का परिवार रहता था | स्नानाघर और शौचालय अहाते के एक छोर पर बनें थे | अहाते के भीतर ही एक चिमनी युक्त बड़ा कमरा अटैच्ड लैट्रीन बाथरूम और ड्रेसिंग रूम के साथ था, जो कुछ रोज़ पहले ही खाली हुआ था | एक ज़माने में वह अम्मा जी के परिवार का अतिथि कक्ष हुआ करता था |  

विवेक की धुंधली आँखे शून्य में ताक रही थीं और शरीर महेश और रुपेश के सहारे बेदम सा आगे बढ़ रहा था | विवेक की हालत देख मंजू के तीनों बच्चे होमवर्क छोड़कर सहम गए | उनकी कॉपी-किताबें डबल बेड पर बिखरी पड़ी थीं | मंजू ने बच्चों का सामान समेटा, विवेक के जूते-मोज़े उतारे और धूल से सने उसके कपड़ो को अपने दुपट्टे से झाड़ दिया | फिर तीनों ने मिलकर विवेक को दीवान पर लेटा दिया | कमरे की शीतलता और बिस्तर मिलते ही विवेक जैसे गहरी नींद में डूब गया |

"भाभी जी, कोई ज़रूरत हो तो बुला लेना | फ़िक्र मत करना |" काफी देर इंतज़ार करने के बाद महेश और रुपेश विदा हुए |

रात काफी हो चुकी थी | बूढ़ी अम्मा भी कई चक्कर काटकर सोने चली गयी थीं |  बच्चे खाना खाकर सो चुके थे; लेकिन विवेक की चिंता में मंजू की आँखों से नींद कोसों दूर थी | विवेक का शरीर बुखार से तप रहा था | वह बेहोशी में बार-बार पुकार रहा था-

“माँ .... माँ .... कहाँ हो तुम .... मुझे अकेला मत छोड़ना !

शहर आने के कुछ दिनों बाद ही विवेक की नौकरी लग गयी थी, लेकिन परिवार से अलग अकेला रहने का दर्द क्या होता है, यह उसे अब समझ आ रहा था | गाँव में भरा-पूरा परिवार, शुद्ध आब-ओ-हवा, बड़ा घर, खुला आँगन, खेत-खलिहान, धारे-पंदेरे, नदियाँ, जंगल, पशु-पक्षी, संगी-साथी और नाते-रिश्तेदार - सब कुछ तो उसके पास मौजूद था | लेकिन यहाँ, परिवार से अलग-थलग वह अपने-आप को बहुत अकेला महसूस करने लगा  था | सुबह खाली पेट ऑफिस जाता और चाय नाश्ता व दिन का भोजन अक्सर ऑफिस की कैंटीन में ही कर लेता था | रात को मन होता, तो गाँव से साथ लाये स्टोव पर, गिनती के चार बर्तनों में से किसी एक में खिचड़ी पका लिया करता था |

गाँव से शहर आये विवेक को डेढ़ साल होने को थे, लेकिन वह अपने-आप को शहरी परिवेश में नहीं ढाल पाया था | लोगों का बनावटीपन, कथनी-करनी का भेद, बोल-चाल का लहजा और द्विअर्थी शब्दों को समझना  उसकी समझ से परे थे | इसलिए बीस साल की उम्र में ही  जितना हो सके, चुप रहना उसने सीख लिया था

कमरे से विवेक का दफ्तर आठ किलोमीटर दूर था गाँधी चौक तक पहले चार किलोमीटर उसे पैदल  चलना पड़ता और फिर वहां से अगले चार किलोमीटर नगर बस से वह दफ़्तर पहुँचता था | वापसी में पहले नगर बस और बाकी रास्ता वह पैदल ही नापता था | इसलिए वह सुबह जल्दी निकल जाता और देर शाम को कमरे में लौटता था | उस दिन भी बस से उतरने के बाद जब वह आधे रास्ते पहुंचा ही था कि अचानक चक्कर खाकर गिर पड़ा | आधी रात को उसे होश आया, तो उसने खुद को मखमली बिस्तर पर पाया |

कमरे में हल्की गुलाबी रोशनी पसरी थी | छत पर पंखा अपनी पूरी ताकत के साथ चक्कर लगा रहा था | सामने वाले डबल बेड पर मंजू के तीनों बच्चे - दो लड़के और एक लड़की- गहरी नींद की आगोश में थे |  दीवार के सहारे दो कुर्सियां और एक बड़ा मेज़ डटा था | कुर्सियों पर बच्चों के स्कूली बैग रखे थे, तो बड़े मेज के ऊपर खामोश ‘सलोरा’ ब्लैक एंड व्हाइट टीवी की स्क्रीन पर कुछ आकृतियाँ हरकत कर रही थीं | सेंटर टेबल पर बिछे क्रोशिए से बुने सफ़ेद मेजपोश की झालरें पंखे की हवा से टीवी में चल रहे चलचित्रों की ताल पर करतब दिखाने में अभ्यस्त थीं |

दरवाज़े के ठीक ऊपर टंगी दीवार घड़ी में रात एक बजे का समय हो रहा था | विवेक को कुछ समझ नहीं आ रहा था;  उसे लग रहा था जैसे वह कोई सपना देख रहा है | वह बिस्तर पर लेटे-लेटे यह सब देख ही रहा था कि अचानक हल्के गुलाबी रंग का सूट पहने एक युवती कमरे का जालीदार दरवाज़ा खोलकर भीतर आई और उसके सिराहने बैठ गयी | उसके हाथ में पानी से भरा कटोरा था | जैसे ही उसने कटोरे से भीगा रुमाल निकालकर विवेक के माथे पर रखा, विवेक हड़बड़ाकर उठ बैठा |

“लेटे रहो | तुम्हे अभी बुखार है |” मंजू ने उसे लेटने का इशारा करते हुए कहा |

“मैं यहाँ कैसे? मैं तो ....!विवेक आगे कुछ बोल पाता, उससे पहले ही मंजू ने छोटे बच्चे की तरह उसे चुप करा दिया और उसके माथे पर गीली पट्टी रख दी |

विवेक एकटक मंजू को निहारता रहा | उसे वहाँ कमरे में आए छह महीने हो गए थे, लेकिन उसने इससे पहले न कभी मंजू के कमरे में क़दम रखा, ना ही उसको इतने करीब से देखा था | जबकि आये दिन मंजू से उसका आमना-सामना होता ही रहता था | कई बार तो रसोई में काम रही मंजू को उसे रास्ता देने के लिए खिसकना पड़ता था | दोनों की मुलाकात केवल ‘नमस्ते’ तक ही सीमित रही | जब भी विवेक घर में होता अधिकतर अपने कमरे में दुबककर किताबों में सिमटा रहता था | छुट्टी के दिन भी वह सुबह ही कहीं घूमने निकल जाता और देर रात ही घर लौटता था |

मंजू का जन्म अत्यंत साधारण परिवार में हुआ | पांच बहनें और दो भाईयों में वह तीसरे नंबर की थी | पिता किसी निजी विद्ध्यालय में नौकरी करते थे, जिससे बच्चों की पढ़ाई पर ध्यान देना तो दूर ठीक से उनका भरण-पोषण करना भी सरल नहीं था |  इसलिए पंद्रह साल की उम्र में ही, लगभग उसकी उम्र से दुगने सरकारी कर्मचारी विलास के साथ मंजू के हाथ पीले कर दिए | विलास के लिए नशा, गाली-गलौज और मार-पीट करना आम बात थी | इक्कीस वर्ष की उम्र तक पहुँचते-पहुँचते मंजू तीन बच्चों की माँ बन चुकी थी

मंजू भले ही विवेक से छः साल बड़ी और तीन बच्चों की माँ थी, लेकिन पहली बार अपने इतने निकट किसी सुंदर युवती को पाकर उसे यकीन नहीं हो रहा था | बक्त की मार से भले ही मंजू का चेहरा मुरझाया हुआ था, लेकिन उसके छरहरे बदन, लम्बी नाक, गोल चेहरा और आकर्षक नैन-नक्स देख विवेक मंत्रमुग्ध हुए बगैर न रह सका | माथे पर सजी चंद्राकार बिंदी उसकी सुंदरता में चार चाँद लगा रही थी | दिन-भर उछल-कूद मचाने वाले बच्चे ‘घोड़े बेच कर सो रहे थे’ | टीवी के चलचित्रों की बदलती रोशनी मंजू के चेहरे के रंग पल-पल बदल रही थी, जो विवेक के मन को और अधिक विचलित करने में कसर बाकी नहीं छोड़ रही थी |

“क्या हुआ? इतने ध्यान से क्या देख रहे हो? पहले कभी देखा नहीं क्या?माथे की पट्टी वापस कटोरे में रख मंजू ने अपनी हथेली से उसका बुखार परखा |

“अब बुखार उतर गया | अब तुम आराम से सो जाओ, मैं रोशनी बुझा देती हूँ |”  

“नहीं ......,”  विवेक ने उठने की कोशिश करते हुए कहा |

“इतने दिन तुम्हें पड़ोस में हो गए हैं | चलो, किसी बहाने तो सही,  तुमने दीदार तो किया | क्यों, हमसे डर लगता है क्या?” मंजू ने चुटकी लेते हुए कहा |

“आपसे नहीं | भाई से डर लगता है | मैं जब भी उन्हें देखता हूँवह नशे में चूर रहते हैं |”  दीवान से उतरकर फर्श पर कदम रखते हुए विवेक ने कहा |

“अच्छा तो यह बात है! आज तो भाई दूसरे शहर गए हैं, दो-तीन दिन में लौटेंगे | अब तो डर नहीं ?” मंजू ने मुस्कराते हुए कहा और पलंग पर सोई बेटी को थोड़ा आगे खिसकाकर कमर सीधे करने लेट गयी |

विवेक धीरे-धीरे कदम बढाकर कमरे और बरामदे का जालीदार दरवाज़ा खोलकर शौचालय से होकर अहाते में टहलने लगा | आसमान में असंख्य तारे टिमटिमा रहे थे, लेकिन चाँदनी के आकर्षक रूप के सामने बाकी सब धुंधले नज़र आ रहे थे | खुले आसमान के नीचे उसे बंद कमरे से ज़्यादा सुकून मिल रहा था | दिल की धडकनें भी सामान्य होने लगी थीं | उधर दिन भर की थकी-हारी और विवेक के लिए परेशान मंजू की आँख कब लगी उसे पता ही नहीं चला | 

“बेटा ! अब कैसे है तुम्हारी तबीयत?” अचानक खिड़की के पीछे से मकान मालकिन अम्मा की आवाज़ विवेक के कानों में गूंजी |

“जी ठीक हूँ...., मैं तो ....!विवेक ने ऐसे हड़बड़ाकर बोला जैसे बूढ़ी अम्मा ने उसके मन के चोर को पकड़ लिया हो |

“जाओ! अब आराम करो | चाहो तो यहाँ आकर किसी कमरे में सो सकते हो | मुझे तो बैठक में खिड़की के पास सोना ही अच्छा लगता है | यहाँ से चारों तरफ की गति विधियों का पता चलता रहता है |" अम्मा जी ने अँधेरे कमरे की खिड़की के भीतर से कहा |

“नहीं अम्मा, अभी अपने कमरे में जाता  हूँ |” जेबें टटोलते हुए विवेक ने कहा |

“चाबी खो गयी है, | मुझे मालूम है | ताला कल तोड़ लेना |” अम्मा ने कहा | 

“अम्मा, मेरे पास दूसरी चाबी है | मैंने दरवाज़े के ऊपर गौरैया के घोंसले में संभालकर रखी है |” विवेक ने कहा |

“बेटा ! इस उम्र में नींद तो आती नहीं | हर वक्त मन में डर बना रहता है | बहू और पोता-पोतियों को सुध लेने की फुर्सत नहीं | यहाँ इसलिए भी सोती हूँ ताकि मुश्किल घड़ी में किसी को पुकार तो सकूं | एक बात तुमको समझाना चाहती हूँ ...," अपनी बातों में विवेक की दिलचस्पी न देख अम्मा जी कहते-कहते रुक गयी |

विवेक अपनी नई दुनिया में खोया हुआ था | 

“ठीक है अम्मा जी | गुड नाईट |" कहते हुए पंजो के बल उछलकर विवेक ने दूसरी चाबी निकाल ली और दरवाज़ा खोलकर बिना बत्ती जलाए अपनी खाट पर पसर गया |

दफ़्तर से आते हुए रास्ते में उसके साथ क्या हुआ और वह कैसे घर पहुँचा, इन सब बातों से बेखबर विवेक फिर से मंजू के मुखमंडल की अप्रतिम छवि के वशीभूत हो गया | उसके मन में अजीब सी उथल-पुथल मची थी जिसे वह समझ नहीं पा रहा था | दोनों कक्षों के मध्य मात्र एक दीवार का फ़ासला था | उसे लग रहा था, मानो उसके चेहरे की आभा कमरे की दीवार को चीरकर उसके मन के अंधियारे को आलोकित कर रही हो | अब उसकी आँखों से नींद गायब हो चुकी थी | एक बार फिर से शौचालय से आते हुए उसने बरामदे से भीतर झांका, मंजू बच्चों के साथ इत्मीनान के साथ सो रही थी | दीवान खाली पड़ा था - शायद उसने सोचा होगा कि विवेक बाहर से आकर उसमें सोयेगा | उसे अंदाज़ा नहीं था कि विवेक के पास दूसरी चाबी है, जो उसने छुपाकर रखी है | तभी सामने की बंद खिड़की से अम्मा की खांसी की आवाज़ कानों में घड़ी के अलारम की तरह गूंजी और विवेक सकपकाकर अपने कमरे में लौट गया

अगले दिन शनिवार को देर से जागने और उसके अगले दिन रविवार का अवकाश होने के कारण विवेक को घर में ही आराम करना पड़ा | उन दो दिनों में मंजू ने सुबह चाय से लेकर रात के खाने तक विवेक को ज़रा सा भी तकलीफ़ नहीं होने दी | जैसे ही  मंजू को अपने काम से फुर्सत मिलती, वह विवेक के पास चली आती और अपना सुख-दुःख साझा करने बैठ जाती | कई बार तो मंजू की आँखों से आंसुओं का बाँध फूट पड़ता, जिन्हें देख विवेक का मन विचलित हो जाता था | 

इधर, अम्मा को उनकी नजदीकियाँ खलने लगीं और उनकी नजरें पैनी हो गयी थीं  | जब भी वह विवेक के पास  से गुज़रतीं, कृत्रिम रूप से खांसने लगती थी | जैसे कि कुछ समझाना चाहती हो | धीरे-धीरे मोहल्ले में विवेक और मंजू को लेकर कानाफूसी होने लगी |  

"विवेक भाई! सुना है आजकल तुम खूब मौज़ काट रहे हो |" ऑफिस जाते समय एक दिन रुपेश ने तंज कसा 

"कैसी मौज़ ?" विवेक ने अपनी अनभिज्ञता प्रकट करते हुए  पूछा |

"बनाओ मत | हमें सब पता है | बीमारी का फ़ायदा उठाना तो कोई तुमसे सीखे |" महेश ने व्यंग्य किया | 

"अभी ऑफिस के लिए देर हो रही है | शाम को मिलता हूँ |" कहकर विवेक तेज़ी से निकल गया, पर उसके कान अब भी उन कड़वी बातों से जल रहे थे |

महेश और रुपेश के अहसानों के कारण विवेक को उनसे बहस करना उचित न लगा | हालाँकि,  मंजू और उसके परिवार  का सानिध्य पाकर विवेक का उदास मन  प्रसन्न रहने लगा था |  समय मिलने पर बच्चे विवेक के पास अपने गणित और विज्ञान के सवाल लेकर आने लगे - 'अंकल, यह प्रश्न कैसे हल होगा?' | विलास भी आते-जाते हाल-समाचार पूछ लिया करता,  'कैसे को विवेक?' 

विवेक की झलक पाते ही मंजू का मुरझाया हुआ चेहरा खिल उठता था | शायद यही खुशियाँ लोगों की आँखों में खटकने लगी थीं | मोहल्ले की कानाफूसी और बदलते लहजे ने विवेक को भीतर तक झकझोर दिया था | इसलिए, न चाहते हुए भी उसने वहां से कमरा छोड़कर जाने में ही अपनी और मंजू की भलाई समझी |

तिपहिया वाहन अब अहाते से बाहर निकल चुका था। विवेक ने पीछे मुड़कर नहीं देखा, पर उसे पता था कि एक खिड़की अब भी खुली होगी | यही तो दुनिया का दस्तूर है — ‘उससे न तो किसी का दुःख देखा जाता , न ही खुशी |’

 

@विजय मधुर२८४२६