मंगलवार, 23 जनवरी 2018

गढ़वाली कविता संग्रह “सर्ग दिदा पाणि-पाणि” का लोकार्पण


निवेदन : कृपया अपनी प्रति इन पोर्टल से मंगवा कर लोक भाषा के प्रोत्साहन हेतु सहयोग करें |
                     
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लोकार्पण कार्यक्रम का विडियो :

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         19, जनवरी'  2018 को माननीय  श्री  अजय  टम्टा,  केन्द्रीय   वस्त्र   राज्य  मंत्री,  भारत  सरकार                           द्वारा
श्री विजय कुमार “मधुर”  के   कविता संग्रह    सर्ग  दिदा पाणि-पाणि  का लोकार्पण  अपने  सरकारी  निवास 1, जंतर मंतर मार्ग , नई दिल्ली में किया गया| आज हमारे देश के गांवो से द्रुत                गति से पलायन शहरों की तरफ हो रहा है गाँव  के गाँव  खाली हो रहे हैं | वहां की अनगिनत समस्याओं,सामाजिक - राजनैतिक   परिवेश, रीति-रिवाज , खान-पान,  आचार - व्यवहार,  मेले, त्योहार, दैवीय  आपदाओं  और  निरंतर   बदहाल   हो   रही   दशा  का  कविताओं के  माध्यम से  सटीक  चित्रण  देखने  को मिलता  है देव भूमिउत्तराखंड की क्षेत्रीय भाषा गढ़वाली में रचित कविता संग्रह सर्ग दिदा पाणी-पाणीमें |       
   उत्तराखंड जर्नलिस्ट फोरम के सहयोग से आयोजित इस कार्यक्रम में काफी संख्या में गणमान्य व्यक्तियों ने अपनी उपस्थिति दर्ज करके कार्यक्रम को सफल बनाने में अपनी सहभागिता निभाई |
केन्द्रीय वस्त्र राज्य मंत्री माननीय श्री अजय टम्टा जी 
माननीय श्री अजय टम्टा जी ने पुस्तक की कुछ कविताओं का अवलोकन करते हुए पहाड़ों से हो रहे पलायन और समय-समय पर आयी दैवीय आपदाओं का जिक्र किया कैसे उत्तराखंड अलग-अलग जगहों में आयी आपदा से परिवार के परिवार खत्म हो गए पर गहरी चिंता जताई | पहाड़ों की घटती जनसँख्या के कारण वहां की विधानसभा सीटें कम होती जा रहीं हैं | पलायन कर रहे लोगों का उनकी मूल खाता-खतौनी, डाकघर, स्थानीय बैंकों से नाम मिट रहे है | बहुत ही गंभीर और विचारणीय प्रश्न है | जबकि हिमाचल के गाँवों की स्थिति भिन्न है | हिमाचल में साग-सब्जी, फल-फूल आदि को लोग मूल आवश्यकता के साथ-साथ व्यवसाय के रूप में भी देखते हैं | साथ ही कविता संग्रह के शीर्षक पर उन्होंने विस्तार से चर्चा की कि जब गाँव के धारे, पंदेरों, तालाबों में पानी कम होने लगता है तो चोळी(चातक) नाम के  इस पक्षी को चिंता सताने लगती है और वह आसमान से पानी की गुहार लगाता है और कभी जमीन में रुका हुआ पानी नहीं पीता| केवल आसमान से गिरती हुई बारिस की बूंदों से उल्टा उड़ता हुआ अपनी प्यास बुझाता है |


अखिल भारतीय उत्तराखंड महासभा के अध्यक्ष श्री विनोद कुमार नौटियाल ने सर्ग दिदा पाणि-पाणि बोलती पक्षी चोळी की दंत कथाओं पर आधारित बात बताई | लोग कहते हैं कि इस पक्षी ने मनुष्य योनि में कोई बढ़ा पाप किया था जिसके कारण उसे यह श्राप मिला | यदि वह जमीन का रुका हुआ पानी पिएगा तो वह खून बन जायेगा | इसलिए जैसे ही वह पानी के नजदीक जाता है तो उसे वह पानी नहीं रक्त दिखाई देता है |
कवि एवं रंगकर्मी डॉ. सतीश कालेश्वरी जो कि लैंसडौन कैन्टोमेंट बोर्ड में श्री विजय मधुर के पिता प्रसिद्ध समाज सेवी,शिक्षाविद् एवं साहित्यकार स्वर्गीय झब्बन लाल विद्यावाचस्पति के विद्यार्थी थे जैसा कि उन्होने अपने बक्तब्य में बताया | डॉ. कालेश्वरी जी ने पुस्तक में दर्ज कविताओं पर विस्तृत चर्चा करते हुए कहा कि विजय मधुर ने अपनी कविताओं के माध्यम से  पहाड़ की बिषम परिस्थितियों, दुःख-दर्द, महिलाओं की स्थिति, प्राकृतिक आपदाओं में होने वाली क्षति, नशे के बढ़ते प्रचलन, राजनीति आदि को स्पस्ट रूप से दर्शाया है | पहाड़ के जन जीवन का कोई भी पक्ष उन्होंने नहीं छोड़ा है | मधुर जी की एक कविता की झलक :  म्वाळौ  माद्यो
हम लेखि-पैढ़ि सकदां
गोष्ठी सम्मलेन कैरि सकदां
नै-नै अखबार
किताब छपै सकदां
पी.एच.डी. कैरि सकदां
म्वाळौ माद्यो बणै सकदां
अपणी बोली-भाषा
अर पहाडु तैं
पण भै
हत ज्वड़यां छन
वूं खरड़ा डांडौं
रौल़ा-कुमच्यरौं
जै नि सकदां
वख़ रै नि सकदां
अपणि बोली मा
       बचे नि सकदां ।
         *****

वरिष्ठ पत्रकार श्री सुनील नेगी ने कहा कि कवि ह्रदय होना अपने आप में एक बहुत बड़ी बात है | कवि जिस रूप में अपनी कविताओं के माध्यम से समाज का ताना-बाना बुनता है और अपनी कविताओं के माध्यम से समाज की सेवा करता है वह बहुत ही महत्वपूर्ण है | उसकी बराबरी कोई और नहीं कर सकता | आज उत्तराखंड के साहित्यकार अपनी बोली भाषा और संस्कृति को बचाने के लिए बहुत बड़ा काम कर रहे हैं उनकी जितनी तारीफ की जाय उतनी कम है |
वरिष्ठ साहित्यकार, पत्रकार एवं समाचार पत्र सन्डे पोस्ट के सम्पादक श्री अपूर्व जोशी ने अपने बक्तव्य में कहा कि आज हमारी क्षेत्रीय भाषाएँ खत्म होने की कगार पर है निश्चित तौर पर यह कविता संग्रह आने वाली पीढ़ी के लिए मार्ग दर्शन का कार्य करेगी |
कविता संग्रह “सर्ग दिदा पाणि-पाणि” के रचियता श्री विजय मधुर ने  इस अवसर पर सभी लोगों का आभार व्यक्त करते हुए कविता संग्रह के नाम से जुडी कविता का जिक्र किया और कहा आज हमारे पहाड़ों की स्थिति उस पक्षी चोळी की तरह हो गयी जिसके आस-पास पानी के अनगिनत श्रोत होते हुए भी उसे प्यासा रहना पड़ता है | आसमान से विनती करनी पड़ती है ताकि वह अपनी प्यास बुझा सके | साथ ही उन्होंने अपनी कविता सर्ग दिदा पाणि-पाणि को पूर्ण तन्मयता और लयपूर्ण ढंग से गा कर उपस्थित लोगों का मन मोहा |
अपने आप में अनूठे इस कविता संग्रह “सर्ग दिदा पाणि-पाणि” में लोक भाषा के प्रमुख स्तम्भ श्री लोकेश नवानी, बयोबृद्ध साहित्यकार श्री ललित केशवान, कवि डॉ. सतीश कालेश्वरी व कवि एवं समाज सेवी श्री दिनेश ध्यानी के प्रकाशित विचार पुस्तक की प्रमाणिकता सिद्ध करते हैं | श्री लोकेश नवानी जी ने लेख में श्री विजय मधुर को “पहाड़ का जीवन को चित्रकार” बताया है इसमें कोई अतिशयोक्ति नही | यह पुस्तक आपको Blue Rose Publication, Amazon, Flipkart, Shopclues पोर्टल पर Sarg Dida Pani Pani के नाम से उपलब्ध हो जायेगी | 

कार्यक्रम का सफल संचालन डॉ. सतेन्द्र प्रयासी जी द्वारा बड़े ही विद्वता पूर्ण  ढंग से किया गया जिसकी तारीफ किये बिना मंत्री जी भी न रह सके | इस अवसर पर गणमान्य व्यक्तियों में बरिष्ठ पत्रकार श्री योगेश भट्ट, प्रसिद्ध समाज सेवी श्री अनिल पन्त, प्रसिद्ध समाज सेवी श्री विनोद रावत, श्री  दीवान मुकेश सिंह, ललित प्रसाद, दीपक द्विवेदी, जितेन्द्र सजवाण, मयंक शाह, शास्त्री चन्द्र प्रकाश थपलियाल, बिरजू नेगी, अजय कुमार सिंह, शूरबीर सिंह नेगी, मुकुंद अग्रवाल, विजय चौधरी, जफर जैदी, देव प्रकाश, संतोष आर्य, देवेन्द्र आर्य, डॉ, ललित भाकुनी आदि मौजूद रहे | साभार : श्री सुनील नेगी,अध्यक्ष उत्तराखंड जर्नलिस्ट फोरम,दिल्ली |

मंगलवार, 16 जनवरी 2018

तीन कविताएँ

१. हैप्पी न्यू ईयर

न्यू ईयर की पार्टी 
इसने कहा उसने कहा
उसने कहा उसने कहा
करेंगे धमाल
धमाल धमाल धमाल।

बांहो में बाहें डालकर
आंखों में आंखे डालकर
आर्केस्ट्रा के फ्लोर पर
नाचेंगे सारी रात
करेंगे धमाल
धमाल धमाल धमाल।

इसकी यादें उसकी कस्में
कहां बिसरे हम
फिर यारो
किस बात का गम
आओ करें धमाल
धमाल धमाल धमाल।

लाइफ को नया मोड़ दो
नशा वशा छोड़ दो
बीती बातों का
कैसा मजाल
आओ करें धमाल
धमाल धमाल धमाल।
@ २०१८ विजय मधुर


                                         २. साया 


साया 

निभाता है साथ
कभी आगे कभी पीछे 
कभी दाएं कभी बाएं
बेजुबान फिर भी
कह देता सब कुछ
ना ही खाता कस्में
ना ही करता ढोंग 
बफादारी का ।
@२०१८ विजय मधुर






३. कहने वाले

कोशिश की है
बदलने की
पहाड़ की चोटी से 
सूरज को छूने की
उससे सवाल पूछने की
कि क्या तुम वही हो
जिसका ताप बना देता
शीतल जल को भाप
खारे को नमक
पिघला देता पुराने
चट्टान बने हिम खंड
क्या तुम्हारा ताप
नहीं पंहुच पाता है
अत्याचारियों
व्यभिचारियों
ढोंगी पाखंडियों
गद्दारों तक
जो स्वार्थ परक आये दिन
कर रहें हैं सौदा
लगा रहें हैं बोलियां
देश के अरमानों की
तुम मौन
अब मैं कौन
खींच लेता हूँ
हाथ पीछे
जल भी जाता
तो क्या हुआ
है तो नकली
कहने वालों की
कमी नहीं।

@२०१८ विजय मधुर


शुक्रवार, 12 जनवरी 2018

आग्रह : कविता संग्रह : मन की बातें

   १४ अगस्त २०१७ को मेरी दूसरी पुस्तक हिंदी कविता संग्रह "मन की बातें' ने साहित्य जगत में प्रवेश किया | पाठकों द्वारा कविता संग्रह को सराहा गया या नहीं यह तो नहीं जानता लेकिन फटे-पुराने कागजों में दम तोडती रचनाओं को किताब के रूप में नया जीवन अवश्य मिल गया | आज यह कविता संग्रह नीचे दिए गए लिंक्स पर उपलब्ध है | कृपया एक प्रति मंगवा कर हिंदी पुस्तकों एवं रचनाकार को प्रोत्साहित करने का एक आग्रह है |













श्री मनोज कुमार, विधायक दिल्ली एवं गणमान्य व्यक्तियों के साथ 

डॉ. विनोद बछेती, प्रवंध निदेशक डीपीएम्आई के साथ 

स्वयं, श्री मनोज कुमार एवं श्री ललित केशवान जी के साथ 

सुप्रसिद्ध साहित्यकार, पूर्व मुख्यमंत्री एवं सांसद डॉ.रमेश पोखरियाल निशंक जी के साथ 
प्राक्कथन
    कविता रसात्मक वाक्य को कहते हैं, जबकि गद्य रसात्मक होने पर भी कविता नहीं कहलाता | कविता जिस भाव को एक वाक्य में कह देती है गद्य उसे कई वाक्यों में भी नहीं समझा सकता | इसीलिए कविता स्मृति पटल में लहरों के रूप में स्थिर हो जाती है, जबकि गद्य  स्थिर होते हुए भी तरंगित होता रहता है | कविता भावों को जीवित करती है तो गद्य विचार बुद्धि की व्यायाम शाला का विषय है | एक युग था जब गद्य  और पद्य   अलग होते थे, लेकिन वर्तमान की कविता में भाव और विचार एक साथ देखे जा सकते हैं | पूर्व में पद्य   लिखना सरल और गद्य लिखना कठिन होता था, लेकिन वर्तमान में तो यह स्पष्ट नहीं हो पा रहा है, कवि कविता रच रहा है या गद्य  | इसीलिए इसे समीक्षा में आधुनिक कविता कहते हैं | आपके हाथों में कवि ‘मधुर’ का यह कविता संग्रह आधुनिक कविता का एक उदाहरण है |
      2 अक्टूबर सन 1964 में लैन्सडौन में जन्मे प्रसिद्ध समाजसेवी, शिक्षाविद् एवं साहित्यकार स्वर्गीय झब्बन लाल विद्यावाचस्पति और श्रीमती गायत्री देवी के सुपुत्र श्री विजय कुमार ‘मधुर’ को साहित्यिक होने का गुण अपने पिताश्री से ही प्राप्त हुआ | एम.कॉम., एम.सी.ए. जैसी उच्च शिक्षा की उपाधियों से अलंकृत और भारत सरकार के प्रमुख प्रतिष्ठान तेल एवं प्राकृतिक गैस निगम में प्रबंधक के रूप में कार्यरत श्री मधुर मूलतः पौड़ी गढ़वाल जनपद, मवालस्यूं पट्टी के अंतर्गत ‘रणस्वा’ नामक ग्राम के निवासी हैं | पूर्वजों की धरती और संस्कृति से अगाध श्रद्धा रखने वाले इस कवि को जहां ईश्वर ने साहित्य सृजन की अपार सम्भावना को लेकर इस धरती पर अवतरित किया, वहां कर्म के क्षेत्र में तन मन से समर्पित इस समाजसेवी नवयुवक को नव पीढ़ी के प्रेरणा स्रोत के रूप में यशस्वी होने का वरदान भी दिया |
      अनेक पत्र पत्रिकाओं में गढ़वाली और हिन्दी लेखों के लेखन, संपादन और कंप्यूटरीकरण में दक्ष इस नवयुवक ने जहां साहित्य को एक नई दिशा प्रदान की, वहां इन दोनों भाषाओँ में कहानी, कविता और नाटकों का सृजन कर साहित्यिक सृजन में सफल भूमिका निभायी है | वर्ष 1984 से निरन्तर साहित्य सेवा करने वाले कविवर मधुर का सबसे बड़ा ऐतिहासिक कार्य है, अपने पिताश्री झब्बन लाल विद्यावाचस्पति पर तैयार किया गया, उनका स्मृति ग्रन्थ, “प्रसिद्ध समाज सेवी, शिक्षाविद् एवं साहित्यकार स्वर्गीय झब्बन लाल विद्यावाचस्पति स्मृति ग्रन्थ” जिसे पढ़कर श्री विजय कुमार ‘मधुर’ की लेखन और संपादन कला के समक्ष नतमस्तक होने का मन करता है |
      श्री विजय कुमार ‘मधुर’ नवयुग के कवि हैं इसलिए इन्होने “काट छन्द डर के बन्धन स्तर” जैसे कविता अंश के संदेश पालन में छंदों का निषेध कर नए मुक्त छंद में कविताएं रची हैं | इस कविता संग्रह “मन की बात” की प्रथम कविता “चित्तशक्ति:” भले ही छंद विहीन कविता है लेकिन कवि ने इसे सलीखे और मधुर शब्दों में गूंथकर प्रस्तुत किया है जिसमें इनकी कविता कला का सहज अनुमान लगाया जा सकता है | कवि की यह छन्दविहीन कविता भले ही गीतों में गिनी जा सकती है लेकिन इसकी गतिशीलता किसी छंदयुक्त कविता से कम नहीं है |
      आज का युगीन कवि भले ही छायावाद का नाम सुनकर विदकने लगा है लेकिन यदि कवि प्रतिभावान हो तो उसके मुख से निकली ऐसी छायावादी कविता उसे एक सच्चा कवि होने का प्रमाणपत्र अवश्य देती है | कवि कहता है – “छोड़ दिया है अब मैंने,  अम्बर की ओर ताकना, सघन मेघमालाओं में, छिटकी चांदनी तलाशना |” 
      कवि के मन में जहां अदृश्य शक्ति के प्रति अपार आस्था भाव है, वहीं माता-पिता के प्रति अगाध श्रद्धा भी | इसीलिए कवि ‘मधुर’ अपने पिताश्री स्वर्गीय झब्बन लाल विद्यावाचस्पति के त्याग और बलिदान की ओर संकेत करते हुए कहता है – “आसमान में झिलमिलाते, सितारों के मध्य, देख सकता है तुम्हे वही, जिसने त्याग और बलिदान की, वेदना हो सही |” कवि इनके त्याग और बलिदान की व्याख्या करता हुआ कहता है “जीवन कर दिया समर्पित, माटी के नाम ...|”
      कवि की “मेरी माँ” कविता हृदय की गहराइयों से निकली ऐसी कविता है, जिससे प्रत्येक पर्वतवासी, ग्रामीण, नवयुवक तादात्म्य स्थापित कर इसके भावों और वर्ण्य विषय में अपनी माँ की छवि देखता है | यही नहीं इस कविता को यदि प्रत्येक गढ़वाली नारी की प्रतीकात्मक छवि दर्शन वाली कविता कह दें तो अत्युक्ति न होगी | कवि अपनी माता की छवि शब्दों के माध्यम से अंकित करता है – “गीली लकड़ी सुलगता चूल्हा |”
      इस कविता में कवि मधुर ने अपने शब्द और भावों से जो चित्र खींचा है, उसे बनाने में व्यक्ति को मन का रंग और विचारों की कूचिका की आवश्यकता पड़ती है | कवि मधुर ने अपने स्वभावनुकूल प्रकृति के जो दृश्य सहृदय पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किए हैं वे चाहे स्वयं में इतने स्पष्ट और स्वच्छ हो न हों, लेकिन उनकी अनुकृति, अरस्तु के “अनुकृति सिद्धान्त” को सफल सिद्ध करती है, कवि की “रक्षक” कविता इसका प्रमाण देती है – “तपती धूप, आंधी-तूफान से बचाकर, पाल पोसकर बड़ा किया, जिन पेड़ों को |” 
            कवि मधुर के इस संग्रह “मन की बात” में विविध विषयों एवं रंगों की कविताएं हैं | राजनैतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और साहित्यिक विषयों की कविताएं भी इसकी श्रीवृद्धि करती है | साहित्यिक विषय पर लिखी इनकी कविता “हिन्दी दिवस” में कवि अपनी कविता संपति की ओर संकेत करते हुए कहता है कि “हिन्दी दिवस” के बहाने मैं प्रत्येक वर्ष अपनी सोयी हुई कविताओं में से एक को जगा लेता हूं | कवि की यह कविता मानवीयकरण अलंकार का अद्वितीय उदाहरण है जो कि एक यथार्थवादी कविता है | 
      इस कविता संग्रह की एक कविता है ‘नकाब’ यह एक ऐसा व्यंग्य है जो बहुभेषी राजनीतिकों पर कसा गया है, कवि कहता है – “नकाबों का बाजार गर्म है, बिक रहे हैं खूब, फुटपाथों से लेकर वातानुकूलित, बड़ी-बड़ी दुकानों पर |”
      आज का सत्य, प्रगति का प्रतीक और उन्नति की लीक बन गया है कम्प्यूटर | लेकिन इसने जीवन की धारा बदल दी है, अब नई पीढ़ियां उदास हैं | इसने हमें अपना गुलाम बना दिया है कि हम अपने ढंग से सोच भी नहीं सकते | इससे हमारी संवेदनाएं समाप्त हो चुकी हैं | कवि इसी ओर संकेत करके कहता है – “कंप्यूटर युग, कंप्यूटरी बातें,  लम्बे दिन, छोटी रातें |” 
      कवि मधुर कवि ही नहीं, विचारक भी हैं तो विचारों के प्रचारक भी | इन विचारों को प्रश्नों के माध्यम से साहित्य जगत तक पहुंचाने वाले इस कवि के ‘मन’ में पांच प्रश्न उभरते हैं | इन प्रश्नों का सम्बन्ध है अपराध, न्याय, क़ानून, प्रतिभूति(जमानत) और सजा से | इनकी परिभाषा पूछने वाला यह कवि कहीं न कहीं आज के न्याय और उससे आहत उस व्यक्ति के विषय में सोचता है, जो अपराधी है ही नहीं | कवि ने केवल मुक्त छंद में ही कविता को कलेवर नहीं सौंपा अपितु गीत शैली की कविता भी गुनगुनाई है | “नींद हराम, मैं क्या करूं मेरे राम !”
      कुल मिलाकर इस कविता संग्रह से कवि ‘मधुर’ की जो कविताएं पाठकों के हाथों में आयी हैं, उनकी भाषा बड़ी मधुर, वाक्य नपे तुले और शब्द चयन प्रशंसनीय है | न तो इनमें आज के दिलजले कवियों की अश्लील भाषा और नहीं द्वेष फैलाने वाले भाव | इन कविताओं में आक्रोश, ईर्ष्या और द्वेष भावना तो दूर-दूर तक दिखाई नहीं देती | यह कविता संग्रह, सभ्य संसार की संस्कृतिपरक अभिव्यक्ति है |
      कवि विजय कुमार ‘मधुर’ का रचना जगत में स्वागत हो, इन्ही शुभकामनाओं के साथ मै अपने शिष्य को साहित्य जगत में आगे बढ़ने का आशीर्वाद देता हूं |

 डॉ. नन्दकिशोर ढौंडियाल ‘अरुण’
राजकीय स्नातकोत्तर  महाविद्यालय
कोटद्वार, पौड़ी गढ़वाल 

रविवार, 15 अक्तूबर 2017

कविता : छलकने दो आंसू

छलकने दो आंसू
मत रोको
करने दो मनमानी उसे 
मत कोसो 
कौन कहता है ये
अपनों ने दिए हैं घाव
मिल ही जायेगी
तपती दुपहरी में
किसी पेड़ की छांव
छलकने दो आंसू ............
किश्मत, अपना-पराया
एक फेर है
यह जँहामाटी का ढेर है
पनपते इसी में
सारे जीवी-परजीवी
पेड़-पौधे, बनस्पति
कभी तो आयेगी
उसे सुमति
छलकने दो आंसू.........
नदी-नाले उफनते हैं
ख़ास मौसम में
सागर की लहरें
पार कर देतीं हैं हद
सीमा निर्धारित है सबकी
क्षणिक है कद और मद |
छलकने दो आंसू ........
@२०१७ विजय मधुर 

पुण्य तिथि स्व. झब्बन लाल विद्यावाचस्पति , पुस्तक विमोचन एवं कवि सम्मलेन

विगत 14 अगस्त 2017, स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर पर्वतीय अंचल की वर्ष 1923 में स्थापित अग्रणीय संस्था गढ़वाल हितैषिणी सभा, वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली चौक, पंचकुईया रोड, दिल्ली  द्वारा उस महान विभूति को याद किया गया जिसे आज की नव पीढ़ी प्रायः जानती ही नहीं | नाम है प्रसिद्ध समाज सेवी, शिक्षाविद् एवं साहित्यकार स्व. झब्बन लाल विद्यावाचस्पति | अवसर था उनकी 21वीं पुण्यतिथि |
इसी अवसर पर उनके पुत्र श्री विजय कुमार मधुर के कविता संग्रह मन की बातें का विमोचन माननीय श्री मनोज कुमार, विधायक कोंडली, दिल्ली के कर कमलों से किया गया | कार्यक्रम सफलता पूर्ण इस प्रकार सम्पन्न किया गया |
१, स्व. झब्बन लाल विद्यावाचस्पति जी को श्रद्धांजलि
२. स्व. झब्बन लाल विद्यावाचस्पति जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर प्रबुद्धजनों के विचार |
३. श्री विजय कुमार मधुर के कविता संग्रह मन की बातें का लोकार्पण माननीय श्री मनोज कुमार, विधायक कोंडली, दिल्ली के कर कमलों द्वारा |
४. हिंदी, गढ़वाली, कुमांउनी कवि सम्मलेन |
      प्रमुख वक्ताओं में श्री मनोज कुमार, हरपाल रावत, गणेश चंद्रा, ललित केशवान, राजेंद्र सिंह राणा, दीप प्रकाश भट्ट, अनिल पन्त, योगेश भट्ट, दिनेश ध्यानी, डॉ. सत्येन्द्र सिंह प्रयासी आदि ने अपने विचार व्यक्त किये | कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार श्री ललित केशवान जी ने की तथा मंच संचालन श्री दिनेश ध्यानी जी द्वारा किया गया |
      कवि सम्मलेन में सर्वश्री ललित केशवान, दिनेश ध्यानी, विजय मधुर, वीरेंद्र नेगी राही, रमेश हितैषी, चन्दन प्रेमी, ओमप्रकाश आर्य, वीरेन्द्र अजनवी, आशीष सुन्द्रियाल, पंकज पैन्यूली, जयपाल सिंह रावत आदि ने सुन्दर कविताओं से श्रोताओं को मन मोहा |  

 प्रसिद्ध समाजसेवी, शिक्षाविद् एवं साहित्यकार स्व. झब्बन लाल विद्यावाचस्पति 
जन्म              :     01 मार्च 1934
पिता का नाम  :     स्व. प्रेम चंद टम्टा
माता का नाम  :     स्व. विन्द्रा देवी
पत्नी का नाम  :     श्रीमती गायत्री देवी
जन्म स्थान     :      ग्राम रणस्वा, चौन्दकोट, पौड़ी गढ़वाल
देहावसन          :     14 अगस्त 1996

प्रसिद्ध समाजसेवी, शिक्षाविद् एवं साहित्यकार स्व. झब्बन लाल विद्यावाचस्पति स्मृति ग्रथ से साभार

वर्ष 1946 : 12 वर्ष की आयु में प्राइमरी पाठशाला के प्रांगण में देश की आजादी के लिए नारेबाजी के जुर्म में हेड मास्टर के हाथों सजा |      पृष्ठ संख्या 48,238
वर्ष 1949 : 15 वर्ष की आयु में मिडिल पास करते ही गाँव के खलियान में स्कूल की शुरुआत |
वर्ष 1950 से 1952  गाँव में स्थाई प्राइमरी स्कूल की मान्यता मिलने के बाद जिला पौड़ी गढ़वाल के दूर दराज के स्कूलों में अप्रिशिक्षित अध्यापक के तौर पर अध्यापन कार्य |
वर्ष 1953-1954 : हिदुस्तान टीचर सर्टिफिकेट कोर्स |
वर्ष 1955 से 1966 : पौड़ी गढ़वाल के बिभिन्न स्कूलों में स्थाई अध्यापक के तौर पर अध्यापन कार्य | पृष्ठ संख्या 48

वर्ष 1966 : केन्टोमेंट बोर्ड लैंसडौंन  के कंपनी बाग़ के अध्यापक एवं काल्गढ़ी के इंचार्ज पद से त्याग पत्र |
       चुनाव हारना तो निश्चित था यह तो वह भी जानते थे इसलिए फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा और जुट गए सामाजिक कार्यों में |

1967 से 13-08-1996 तक के आन्दोलन

भूमिहीन आन्दोलन : पृष्ठ संख्या 36-43
एक आन्दोलन कारी के रूप में उन्होंने झंडा हाथ में लेकर उत्तर प्रदेश के असंख्य भूमिहीनों को भूमि का हक़ दिलवाया | जिसमे 1972 के दौरान वह उत्तर प्रदेश भूमि व्यवस्था जांच समिति के सदस्य भी रहे जिसमें यात्रा आदि के दौरान उन्हें राजपत्रित अधिकारी का दर्जा हासिल था | असंख्य लोगों को मैदानी क्षेत्र में भूमि आवंटित कराने वाले इस ब्यक्ति ने कभी भी अपने क्षेत्र से दूर बसने की कामना नहीं की  |  

शिक्षा का आन्दोलन : पृष्ठ संख्या 36-43,248,266,269
क्षेत्र में हिंदी अंग्रेजी स्कूलों की स्थापना | जिसमे उनकी भूमिका प्रधानाध्यापक, प्रबंधक, सरंक्षक, अध्यक्ष आदि के रूप में रही | आज भी प्राइमरी से लेकर डिग्री कालेज तक के यह स्कूल प्रबंधक मंडल या सरकार के अधीन सुचारू रूप से चल रहे हैं तथा लाखों विद्यार्थियों का भविष्य निर्माण कर रहे हैं | 

राजनैतिक आन्दोलन : पृष्ठ संख्या 65-120,211,217
वर्ष 1967 : विधान सभा क्षेत्र एकेश्वर पौड़ी गढ़वाल से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव में हाथ आजमाए |
चुनाव चिन्ह था उगता हुआ सूरज |
घोषणा पत्र :
1.       एकेश्वर क्षेत्र के अंतर्गत डिग्री कॉलेज की स्थापना |
2.       एकेश्वर विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत कालेजों में ओवरसियरी तथा टेक्निकल कक्षाएं खुलवाना |
3.       क्षेत्र में जच्चा बच्चा अस्पताल खुलवाना |
4.       शिक्षकों का न्यूनतम वेतन रु.200/- प्रतिमाह |
5.       सार्वजनिक निर्माण विभाग में मजदूरों एवं निजी मजदूरों का न्यूनतम पारिश्रमिक केन्द्रीय सार्वजनिक निर्माण विभाग के मजदूरों की तरह निश्चित करना |
6.       भ्रष्टाचार के विरुद्ध निसंकोच आवाज उठाना उसे दूर करवाना  |
7.       वन संपदा से मिलने वाली ओषधियों एवं एनी वस्तुओं से सम्बंधित उद्योग धंधे स्थापित करवाना |
8.       क्षेत्र में अर्द्ध निर्माण की गयी सड़कों को पूरा करवाना |
9.       केन्द्रीय स्थानों से प्रत्येक गाँव गाँव तक पुलों का निर्माण कर यातायात का सम्बन्ध स्थापित करना |
10.    गाँव-गाँव में पेयजल तथा सिंचाई योजनाओं को स्वीकृत करवाना |

अपील गढ़वाली रचना के माध्यम से :
             नोटू की वहार मा वोट ना विकै दिंया
             लड्डू दाणी धोती मा अफु न बिकी जयां |
अंयु राज आज यो रावणु का हाथ मा
गरीबु की हंसी करदीं बंगलों की शानी मा |
घुमला बजारू मा डांडी कांठी रौल्यूं मा
बखाला फोंदरू तैं गरीबु सताण मा |
आज भोल आला ये बिरली का बेश मा
दूध पेकी छिन्गुरयाला शेर का ठमाण मा |
गाँधी की ढकीं धरीं लग्यां छन लुटाण मा
राति जाला थाति मा पद्नू का पास मा |
बैर भौ फैलंदी भै बंधू  का बीच मा
आरी धैरी चीरा करदीं जाति गोळ रींडा मा |

 राजनैतिक हस्तक्षेप : 
·         दो बार विधानसभा तथा एक बार विधान परिषद का चुनाव लड़ा
·         अध्यक्ष भारतीय रिपब्लिकन पार्टी पौड़ी गढ़वाल |
·         कार्यकारिणी सदस्य, महामंत्री, उपाध्यक्ष जिला कांग्रेस कमेटी |
·         संयोजक उत्तर प्रदेश ग्रामीण मजदूर कांग्रेस |
·         आदि  

सरपंच : पृष्ठ 122-125
      1986 में लगभग 1500 की जनसंख्या व 22 हक्टेयर वन क्षेत्र में पञ्च परमेश्वर में से एक सरपंच के रूप में उन्होंने 24 वर्षों तक कुशल भूमिका निभाई | जिसका जिक्र आज भी गाँव के पुराने लोग करते हैं |

निदेशक गढ़वाल मंडल विकास निगम : पृष्ठ 125-128
      वर्ष 1983 से 1986 के दौरान गढ़वाल मंडल विकास निगम में बतौर निदेशक कार्य किया जिसमें समय गढ़वाल मंडल की कार्य शैली, विश्राम गृह, फ्लशडोर फैक्ट्री, रोजिन व तारपीन फैक्ट्री के मूल्यांकन के साथ – साथ स्टाफ, रोजगार में स्थानीय युवकों को प्राथमिकता पर भी प्रस्ताव पारित कर उनका क्रियान्वन करवाया गया |
साथ ही  पृष्ठ 128 -135
·         क्षेत्र विकास समिति की बिभिन्न समितियों में अध्यक्ष , जेष्ठ प्रमुख |
·         आर्य समाज चौन्दकोट के महामंत्री
·         भारत ज्ञान विज्ञान समिति के संयोजक
·         गढ़वाली भाषा परिषद् के सदस्य अदि संस्थाओं में कार्य करने का उनका उल्लेख पाया गया |
पत्र कारिता एवं सम्पादक गढ़ चेतना : पृष्ठ 136 -147 , 216, 267,270,284
      क्षेत्रीय संवादाता के रूप में बिभिन्न पत्र पत्रिकाओं जिनमें कर्मभूमि, सत्यपथ, दैनिक पर्वतीय, हिमालय टाइम्स के माध्यम से वह क्षेत्र की समस्याओं को जन – जन तक पंहुचाने का कार्य करते थे तथा अपने लेखनी के माध्यम से समस्याओं का निवारण करवाते थे |
सुदूर नौगांवखाल पौड़ी गढ़वाल से साप्ताहिक गढ़चेतना का संचालन भी उन्होंने आरम्भ कर दिया | सुदूरवर्ती पर्वतीय क्षेत्र से प्रकाशित यह पहला ही साप्ताहिक पत्र रहा हो |
उत्तराखंड आन्दोलन : पृष्ठ 10,210,250,262
      स्व. झब्बन लाल जी उत्तराखंड स्वतंत्र राज्य के पक्षधर रहे हैं  लेकिन समाज में फ़ैली  तरह तरह की मन गणत भ्रातियों से आहत भी | जिसका उल्लेख समाचार पत्रों में प्रकाशित उनके पक्ष और बुद्धिजीविंयों के लेखों से स्पष्ट होता है | सामाजिक भ्रातियों से बाहर निकल लोगों में पृथक राज्य आन्दोलन के प्रति जागरूकता पैदा करने का कार्य उन्होंने बखूबी किया | लेकिन दुर्भाग्य कुछ महापुरुष केवल संघर्ष करने के लिए पैदा होते हैं | सुख भोगने के लिए कोई और |
साहित्यिक आन्दोलन : पृष्ठ 138,271-289
      जैसा कि उनके सहपाठी श्री योगेश पांथरी जी ने जिक्र  किया है |जो उम्र बच्चों की खेलने कूदने की होती है, उस उम्र में स्व. झब्बन लाल विद्यावाचस्पति जी के मन में देश प्रेम का वह जज्बा था कि 12 वर्ष की आयु में अपनी प्राईमरी पाठशाला के प्रांगण में वर्ष 1946 में अंग्रेजी हुकूमत के विरोध में नारेबाजी शुरू कर दी जिसका दंड स्कूल हेड मास्टर के द्वारा उन्हें बेंतों के रूप में दिया गया | आगे चलकर वर्ष 1965 में उनका पहला प्रकाशित साहित्य “ स्व राष्ट्र वीर वंदना” के नाम से पाठकों  के मध्य आया |
डॉ.नन्द किशोर ढौंडियाल जी के शब्दों में – श्री झब्बन लाल विद्यावाचस्पति जी का साहित्य अनेक दृष्टिकोणों से समाजोपयोगी रहा है | अपने जीवनकाल में इस त्यागवीर ने जो कुछ भी लिखा उसका अधिकांश अनेक पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हुआ | उन्ही पत्र पत्रिकाओं के माध्यम से पाठकों को यह ज्ञात हुआ कि हिमालय की कंदराओं में जन्म लेने वाला यह साहित्यकार समाज के विषय में क्या सोचता है और वह समाज के लिए क्या करना चाहता है | इस साहित्यसेवी ने गोलोक में प्रवेश किया तब इनके मातृलोक में रह गया था इनका कुछ प्रकाशित तो कुछ अप्रकाशित साहित्य, जिसके अवलोकन से साहित्य समीक्षकों को यह ज्ञात हुआ कि श्री झब्बन लाल विद्यावाचस्पति जी साहित्य की अनेक विधाओं के चिन्तक और सृजक थे |
कविता के साथ ही इनका दूसरा रूप गद्यकार का है | इनका यह गद्य पांच रूपों में प्राप्त होता है |
1.      विचारात्मक लेख
2.      पत्र
3.      रिपोर्ट
4.      डायरी
5.      अभिनन्दन पत्र
एक पत्र पुत्र के नाम के कुछ अंश 28-03-1985  : पृष्ठ 151
प्रिय बेटा विजय को ,
      अपनी माता व पिताजी का शुभाशीष | बड़ा भाई सुधांशु, भाभी का प्यार छोटे अनुज जय एवं टुनू तथा बेटी संगीता का प्रणाम | हम सब सहित परिवार कुशल मंगल हैं | तुम्हारी कुशलता के लिए भगवान से प्राथी हैं | आशा करते हैं कि तुम अपनी कुशल पत्रिका यथाशीघ्र समयान्तर्गत प्रेषित किया करोगे |
      बेटा तुमने लिखा मेरी परीक्षा आरम्भ हो रही है | मुझे विश्वास है कि तुम परीक्षा भली प्रकार देने के पश्चात सफलता अवश्य प्राप्त करोगे | चरित्र ही स्वास्थ्य एवं स्वाध्याय की कसौटी है | कसौटी पर कसने पर ही खोटे-खरे की परख की जाती है | बिना विवेकशील अध्ययन मनन अधूरी विद्या समझनी चाहिए |
      तुम्हारी 7-3-85 की प्रेषित कुशल पत्रिका के साथ मुझे केन्द्रीय सचिवालय हिंदी परिषद, देहरादून में हिंदी परिषद् की कार्यकारिणी गठन 1985-86 के लिए किया गया प्रपत्र प्राप्त हुआ | तुम्हारा नाम कार्यकारिणी में अवलोकन करने पर मुझे अपार हर्ष हुआ और विश्वास किया कि एक साहित्यकार, पत्रकार एवं संपादक का पुत्र अवश्य अपनी प्रखर बुद्धि से अपने साहित्य के आधार पर देश, काल, और परिस्थिति में सामाजिक सेवा करने में सफलता हासिल करेगा |
      बेटा साहित्यकार अपने साहित्य की शब्दरूपी श्रृंखलाओं से जिस प्रकार प्राणी-मात्र को समय की गति से संजोता है वह उसके पवित्र मन के उदगार होते हैं , बिना स्वाध्याय का साहित्य शब्द रचना नीरस होती है | साहित्य चाहे कोई भी हो उसके लिए साहित्यकार के पास विशाल शब्द भण्डार का होना अति आवश्यक है |
         गांधी जी ने कहा था
            मैं लाया हूँ तूफान से किश्ती निकाल के |
            इस देश को रखना मेरे बच्चों संभाल के ||
      यही स्थिति मेरे पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन की रही है | मैंने अपने कठिन परिश्रम से जो भी किया उससे तुम पूर्ण परिचित हो | मुझे आशा ही नहीं, पूर्ण विश्वास है कि तुम गाँधी जी की उपरोक्त कड़ियों को मेरी जीवन लड़ियों के साथ जोड़कर रखोगे |
      आज मुझे बहुत समय पश्चात् तुमको ऐसा पत्र लिखने का समय मिला | तुम पत्र फाड़कर किसी रद्दी की टोकरी में न डाल देना | बल्कि किसी फाइल में मेरे पत्रों को संभाल कर रखना | शायद नेहरु जी के पत्र ‘पिता के पत्र पुत्री के नाम’ वाली बात मेरे जीवन में भी सार्थक बन जाए |
                                                                                               तुम्हारा पिता |
      14 अगस्त 1996 को प्रसिद्ध समाजसेवी, शिक्षाविद् एवं साहित्यकार स्व. झब्बन लाल विद्यावाचस्पति जी की काया नश्वर काया में बिलीन हो गयी | क्षेत्र के प्राईमरी से लेकर डिग्री कॉलेज में जहाँ राष्ट्र गीतों एवं उनके राष्ट्र भक्ति से ओत-प्रोत भाषण गूंजते थे मातम के बादल छा गए | लेकिन उनके परममित्र, लेखक एवं प्रखर पत्रकार स्व. डॉ. उमाशंकर थपलियाल जी ने पृष्ठ 207 में सही लिखा है |
      मेरा तो मानना है कि ऐसे कर्मबीर कभी नहीं मरते | वे जिन्दा रहते हैं | कहा जाय तो भाई झब्बन लाल आज भी कहीं जिन्दा है, अपने विचारों के रूप में, अपने संघर्ष के रूप में जो उन्होंने अन्याय और अत्याचार के बिरुद्ध छेड़ा | उनकी कलम जब भी उठी होगी तो दमन कारियों के विरुद्ध, शोषणकर्ताओं के विरुद्ध, सामाजिक घृणा फ़ैलाने वालों के विरुद्ध, समाज विरोधी तत्वों के खिलाफ, निर्बल वर्गों की कमर तोड़ने वालों के खिलाफ | इसलिए मैं फिर कहता हूँ कि भाई झब्बन लाल मरा नहीं, वह मरने वाला व्यक्ति था ही नहीं | मरते वे हैं, जो अपने शरीर से जीते हैं | शरीर की सतह से आगे नहीं जीते | शरीर मर जाता है तो वे भी मर जाते हैं | गलत !  भाई झब्बन लाल उनमें से नहीं थे .... तुम हो और मैं सच कहता हूँ कि तुम हो .... तुम विदा होकर भी विदा नहीं हुए |