सोमवार, 17 जनवरी 2011

जन्म भूमि का मोह......

     अभी कुछ बर्ष  पहले  मेरे मामा जी बी.एस.एफ़. से सेव्छिक सेवानिवृत हुए| लगभग ३५ बर्ष आसाम से लेकर पंजाब तक बिभिन्न जगहों पर कार्य करने के बाद | अपनी जन्म भूमि का मोह उन्हें गाँव की ओर ले गया | फंड के रूप में जो भी पैसा मिला था लगा दिया रहने लायक घर बनाने और बच्चों की  शादी में |
           अब पेंसन से गुजारा भी मुश्किल से होने लगा | मामी की तबियत वेसे भी चार पांच साल से खराब ही चल रही थी  | गाँव के बीस तीस किलोमीटर के भीतर कोई डाक्टरी इलाज़ तो होने से रहा | इसलिए झाड - फूँक , टोने टोटके में भी पैसा फूँक दिया | बड़ा   बेटा पहले किसी दुकान  में काम करता था |उससे उसकी पत्नी व दो बच्चों का गुजारा भी न चलता | किसी तरह हिम्मत जुटा कर उसने किराये पर दुकान  लेकर दुकान  चलानी शुरू करदी | उससे उसका  परिवार ठीक ठाक चलने लगा | छोटा बेटा भी गाँव से दूर शहर में एक वर्कशॉप में गाड़ियों का काम सीखने लगा | जीवन की पटरी कुछ - कुछ रास्ते पर आने लगी | परन्तु तब तक बहुत लेट हो चुकी थी | मामा जी को भी मधुमेह और अन्य बीमारियों ने घेर लिया | नियमित उपचार न होने की वजह से एक दिन उनको भी अटैक  पड़ गया जिससे उनकी आवाज बंद हो गयी | आसपास के शहरों में डॉक्टरों को दिखाने के बाद वह पुनः घर चले गए | उनकी तबियत ज्यादा बिगड़ने लगी | खाना पीना भी बंद हो गया | किसी की सलाह पर बड़ा  बेटा दुकान  बंद कर व छोटा नौकरी छोड़ कर उन्हें देहरादून ले आये क्योंकि एक के बस का उन्हें संभालना मुश्किल था  | जंहा उन्हें एक सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया  गया | डॉक्टर ने जरूरी टेस्ट करवाए और उन्हें देखकर कहा - इनका कुछ इलाज़ नहीं हो सकता आप इन्हें वापस घर ले जावो | मैंने सोचा क्या पता डॉक्टर गरीब समझ कर ध्यान नहीं दे रहे हैं | अपनी समझ के अनुसार मैंने उन रिपोर्ट्स को अपने परिचित अन्य डॉक्टरों को दिखाया और सम्बंधित डॉक्टर को भी कहलाया | माँ कहती है  कि " तेरे मामा जी उसी साल  फौज में भर्ती हुए थे जब तू पैदा हुआ | नाना जो कि ब्रटिश आर्मी में थे व  नानी तभी स्वर्ग सिधार गए थे जब हम दोनों भाई बहिन छोटे ही थे | इसलिए तेरे  मामा जी भी उन दिनों हमारे साथ ही रहते  थे" | पिताजी उन दिनों लैंसीडौन में अध्यापक थे | अपनी जन्म भूमि से उनको भी बड़ा  लगाव था | उस समय याने आज से ४४ - ४५ साल पहले गांव की परेशानिया, अंधबिस्वास , अशिक्षा उनसे देखी नहीं गयी | उस समय हमारे लगभग ५०० परिवारों के गांव में इकलौते पढ़े लिखे अध्यापक थे | उन्होंने  अपने पढ़े लिखे होने को दुत्कारा और एक ही झटके में तिलांजली दे दी अपनी पन्द्रह साल पुरानी सरकारी  नौकरी को | उन दिनों मै  मात्र २ बर्ष का था| उनके इस फैसले से भले ही  घर के तमाम लोगों को भारी आघात पंहुचा  हो परन्तु उनके किये हुए सामाजिक कार्य आज भी राज्य में मील के पत्थर की तरह हैं भले ही राजधानी  की चकाचोंध में आज उनका कोई मूल्य न हो | खैर रविबार को जब मै खाना लेकर  अस्पताल पंहुचा तो डॉक्टर ने मुझसे कहा तुम इनकी बेकद्री  मत करो अब  इनके पास ज्यादा बक्त नहीं | इन्हें जितनी जल्दी हो सके इनकी माटी में भेज दो | तुरंत उनके लिए अम्बुलेंस का इंतजाम किया गया और उन्हें उसी हाल में गाँव भेज दिया गया | गाँव में भले ही दूर दूर तक अच्छे अस्पताल की सुबिधा न हो परन्तु मोबाइल फ़ोन की सुबिधा खूब है | आज से पन्द्रह साल पहले तो यह भी  नहीं थी | मुझे खुद अपने पिताजी की देहांत की खबर तीसरे दिन मिली | दूसरे ही दिन सोमबार को रात साढ़े ग्यारह बजे मोबाइल की घंटी बजी |नंबर देखकर ही मै समझ गया ....मामा जी अब नहीं रहे | बार बार मेरे आँखों के सामने अम्बुलेंस में लिटाते हुए उनकी  डबडबाती   आँखे घूम   रही थी जो मानो मुझसे कह रही हों कि अपनी जन्म भूमि से प्यार करने वालों का क्या यही हस्र होता है  ?????????
Copyright © 2011 विजय मधुर

रविवार, 16 जनवरी 2011

नव बर्ष में


कुछ बातें
कुछ वादे
छोड़ गया
बीता बर्ष |


गुदगुदाती 
खुशनुमा
यादों    का 
दे गया कर्ज |

करूँ कैसे अदा
रहो संग सदा
लुभाना तो आता नहीं
बसीं हैं मन में बस वही अदा |
Copyright © 2011 विजय मधुर