घर के जरुरी काम-काज निपटाने के बाद जया बच्चों को होम वर्क कराने बैठी
ही थी कि बरामदे में पड़ोस के महेश और
रुपेश द्वारा विक्की को थामते हुए लाते देख घबराकर दौड़ी-दौड़ी बाहर आयी|
“क्या हुआ विक्की को?” जया ने पूछा |
“भाभी जी विक्की भेल चौक के पास बेहोश पड़ा था | आस-पास लोगों की भीड़
जमा थी| वह तो अच्छा हुआ हमने उस तरफ नज़र दौड़ा ली | वरना बेचारा न जाने कब तक लावारिशों
की तरह नाली में पड़ा रहता | लोग कह रहे थे ‘शराब पीकर नाली में पड़ा है| जब होश
आयेगा अपने-आप उठ खड़ा होगा |” हांफते हुए पसीने से तरबतर महेश ने पसीना पोंछते हुए कहा |
“हे ! भगवान | भगवान ने बचा लिया , किसी गाड़ी के नीचे आ जाता तो क्या होता ?” जया ने विक्की को सहारा देते हुए कहा |
कमरे के दरवाजे पर पंहुचते ही महेश ने विक्की के पैंट-कमीज की जेबें
टटोली लेकिन कमरे की चाबी नहीं मिली| शायद रास्ते में कहीं गिर गयी थी |
“अब क्या करें ?” जया की तरफ देखते हुए महेश ने कहा |
“चलो हमारे कमरे में ही सुला देते हैं| जब इसे होश आ जायेगा तब कमरे
का ताला तोड़ देंगें |” अपने कमरे की ओर ले जाते हुए जया ने कहा |
“यही ठीक रहेगा |” महेश और रूपेश ने एक साथ कहा|
जया और विक्की के कमरे एक कतार में साथ-साथ थे| दोनों कमरों को एक लम्बे बरामदे ने जोड़कर रखा था| बरामदे के एक कोने पर जया की रसोई थी तथा बीच में जालीदार गेट| विक्की की आँखे आधी बंद थी, शरीर महेश और रुपेश के इशारों पर गतिशील था | विक्की की हालत देख जया के तीनों बच्चे अपने स्कूल का होम वर्क छोड़कर दीवान में सिमट कर बैठ गए | उनकी कापी किताबे डबल बेड में बिखरी पड़ी थी | जया ने बच्चों की कापी-किताबे एक तरफ कर विक्की के जूते-मौजे उतारे और धूल से सने कपड़ो को बेड पर पड़े अपने दुपट्टे से झाड लिया| तीनों ने मिलकर विक्की को डबल बेड पर लिटा दिया| काफी देर इंतज़ार करने के बाद भी जब विक्की को पूरी तरह होश नहीं आया तो महेश और रुपेश अपने घर चले गए|
रात काफी हो चुकी थी| बरामदे के ठीक सामने अकेली मकान मालकिन बूढ़ी अम्मा भी दो-तीन चक्कर मारकर अपने
कमरे में सोने चली गयी | जया के तीनों बच्चे खाना खाकर सो चुके थे| विक्की के स्वास्थ्य के लिए चिंतित जया की आँखों से नींद कोशों दूर थी| विक्की का शरीर बुखार से तप रखा था| बेहोशी की हालत में वह बार-बार पुकार रहा था|
“माँ .... माँ .... कहां है तू .... मुझे मत अकेला मत छोड़|”
गाँव से आकर विक्की को शहर में डेढ़ साल हो गए थे| साल भर के भीतर ही सरकारी
नौकरी लग गयी थी | लेकिन परिवार से अलग अकेला रहने का दर्द क्या होता है | वह भली भांति
महसूस करता था | गाँव में भरा पूरा परिवार, शुद्ध आबो हवा, बड़ा घर, खुला आँगन, खेत
खलिहान, धारे-पंदेरे, नदियाँ, जंगल, पशु-पक्षी, संगी-साथी, नाते-रिश्तेदार आखिर
क्या न था उसके पास| लेकिन यहाँ अलग-थलग अकेला| सुबह खाली पेट ऑफिस जाता चाय नाश्ता
और दिन का भोजन अक्सर ऑफिस की कैंटीन में ही करता था | रात को मन होता तो गाँव से
साथ लाये स्टोव में गिनती के चार बर्तनों में से किसी एक में खिचड़ी पका लिया करता था|
गाँव के वातावरण में पले-बढ़े विक्की को शहर की आबो-हवा पसंद नहीं आयी, इसलिए बीस साल की उम्र में ही अधिकतर चुप रहना उसे बेहतरीन उपाय लगा | विक्की का दफ्तर आठ किलोमीटर
दूर होने के कारण पहले चार किलोमीटर तो उसे पैदल गाँधी चौक तक चलना पड़ता और फिर
वहां से दफ़्तर के लिए सीधी बस मिलती थी|
वापसी में पहले चार किलोमीटर नगर बस से और बाकी चार किलोमीटर पैदल घर तक | इसलिए
वह सुबह जल्दी दफ्तर के निकल जाता और देर शाम
को कमरे में लौटना होता था | आज भी वह बस से उतरने के बाद जब आधे रास्ते तक पहुंचा
ही था कि अचानक चक्कर खाकर गिर पड़ा | आधी
रात को जब उसे होश आया तो उसने अपने-आप को डबल बेड में पाया |
कमरे में हल्की गुलाबी रंग की रोशनी पसरी थी| छत पर अपनी पूरी रफ्तार के
साथ पंखा घूम रहा था | सामने वाली दीवार से सटे दीवान पर दो बच्चे सो रहे थे, एक छोटी
बच्ची जिस बेड पर वह लेटा था उसी पर सो रही थी| दूसरी दीवार के सहारे दो कुर्सियां
और एक बड़ा मेज डटा था| कुर्सियों के ऊपर
बच्चों के स्कूली बैग तो बड़े मेज के ऊपर खामोश ब्लैक एंड वाइट सलोरा टीवी पर कुछ तस्वीरें
हरकत कर रही थीं | कुर्सियों के आगे मेज पर क्रोसिया से बुने सफ़ेद रंग के मेज पोस की
झालरें पंखे की हवा से मानों टीवी में चल रहे चलचित्रों को देख हरकत कर रही थीं | विक्की को कुछ समझ नहीं आ रहा था| उसे लग रहा था,
जैसे वह कोई सपना देख रहा है | बिस्तर पर
लेटे-लेटे वह यह सब देख रहा था कि तभी हल्के गुलाबी रंग का सूट पहने खूबसूरत महिला
दरवाज़ा खोलकर भीतर आयी और उसके सिराहने के पास बैठ गयी| उसके हाथ में पानी से भरा
बड़ा कटोरा था | जैसे ही उसने कटोरे से निकाल कर भीगा रुमाल विक्की के माथे पर रखा,
विक्की हडबडा कर उठ बैठा |
“लेटे रहो | तुम्हे अभी भी बुखार है|” जया ने पुनः उसे लिटाते हुए कहा|
“मैं यहाँ कैसे ? मैं तो ....|” विक्की आगे कुछ बोलता जया ने छोटे
बच्चे की तरह चुप करा दिया और उसके माथे पर गीली पट्टी बदल दी|
विक्की एकटक उसे देखता रहा| इतनी सुंदर महिला उसने पहली बार अपने इतने
करीब पाई|
कहने को जया तीन बच्चों की माँ थी | लेकिन उसके छरहरे बदन, लम्बी नाक,
चेहरे की लालिमा, झील सी नीली आँखें, माथे पर चंद्राकर बिंदी देख विक्की
मंत्रमुग्ध हो गया | क्षण भर के लिए वह भूल गया कि वह बीमार है| बच्चे गहरी नींद
की आगोश में थे| टीवी में चल रहे चलचित्रों की रोशनी में जया के चेहरे की रंगत पल-पल
बदल रही थी जो विक्की के कोमल मन को विचलित करने लगी |
“क्या हुआ ? पहले कभी देखा नहीं |” विक्की के माथे की पट्टी एक तरफ रख
जया ने अपनी हथेली से बुखार चेक किया |
“अब बुखार उतर गया | तुम चाहो तो यहीं सो जाओ | मैं रोशनी बुझा देती
हूँ |”
“नहीं मैं अपने कमरे में जाता हूँ |” विक्की उठने लगा |
“इतने दिन तुम्हें पड़ोस में हो गए| पहली बार तुमने मुझे और इस कमरे को
देखा है| क्यों मुझसे डर लगता है?” जया ने चुटकी लेते हुए कहा |
“आपसे नहीं | भाई से डर लगता है | मैं जब भी देखता हूँ वह शराब के नशे
में चूर रहते हैं|” बेड से नीचे उतरते हुए विक्की ने कहा|
“अच्छा तो यह बात है| आज तो भाई दूसरे शहर गए हैं| दो-तीन दिन में
लौटेंगे| अब तो डर नहीं?” जया ने सिरहाने के सहारे कमर सीधी करते हुए कहा |
विक्की धीरे-धीरे कदम बढाकर दरवाज़ा खोलकर बरामदे के बाहर खुले आँगन में चला गया|
आसमान में असंख्य तारे टिमटिमा रहे थे, लेकिन चाँदनी के सुंदर आकर्षक रूप के सामने उसे बाकी सब अदने से नज़र आ रहे थे | बाहर का वातावरण बंद कमरे से ज्यादा सुकून भरा उसे लग
रहा था| उधर दिन भर की थकी हारी जया की आँख लग गयी | विक्की
खुले आसमान के नीचे तारों की छांव में अपने मन के मैल को धोने के लिए अपने आप से
लड़ रहा था |
“बेटा ! अब कैसे है तुम्हारी तबीयत?” अचानक खिड़की के भीतर से मकान
मालकिन अम्मा की आवाज विक्की के कानों में गूंजी |
“जी ठीक है... मैं तो ....|” ऐसे हडबडा कर विक्की ने कहा जैसे बूढ़ी
अम्मा ने उसकी चोरी पकड़ ली हो|
“जाओ अब आराम करो| तुम चाहो तो मेरे बूढ़े के कमरे में सो सकते हो| मैं
बैठक में खिड़की से सटे दीवान में सोती हूँ | वहां से बाहर क्या हो रहा है सब दिखाई
देता है|” अम्मा ने अँधेरे कमरे की खिड़की के भीतर से कहा |
“नहीं मैं जाता हूँ अपने कमरे में|” जेबें टटोलते हुए विक्की ने कहा|
“चाबी खो गयी| मुझे मालूम है| ताला कल तोड़ लेना|”
“अम्मा दूसरी है| मैंने दूसरी चाबी दरवाज़े के ऊपर बने छेद में रखी है|”
कहते हुए विक्की ने पंजों के सहारे चाबी निकाल ली और दरवाज़ा खुला छोड़ चुपचाप अपनी चारपाई पर
लेट गया |
दफ़्तर से आते हुए रास्ते में उसके साथ क्या हुआ| वह घर कैसे पहुंचा इन
सब बातों से बेखबर विक्की फिर से जया के उस मुखमंडल की अप्रतीम छवि के बसीभूत हो गया जिसने उसके कुंठित मन में हलचल पैदा कर दी थी | उसे लग रहा था जैसे उस मुख मंडल की रोशनी कमरे के जालीदार दरवाज़े को
चीरकर उसके अंधियारे मन के भीतर चहलकदमी कर रही हो|
@विजय मधुर२८४२६