ढलती सांझ के धुंधलके में एक साधु महाराज भिक्षा मांगते हुए एक अनजाने गाँव की सीमा में दाखिल हुए। गाँव में अजीब सन्नाटा था। वह जिस भी ड्योढ़ी पर कदम रखते, वहाँ एक भारी ताला उसका स्वागत करता। देखते ही देखते रात का अंधकार गहराने लगा। आस-पास कोई दूसरा ठिकाना भी न था। संकट की इस घड़ी में वह एक वीरान मकान के ओटारे पर बैठ अपनी नियति को टटोलने लगे।
अचानक अँधेरे को चीरते हुए चार साए उभरे। शराब के नशे में धुत उन युवकों ने साधु को देखा और अट्टहास करते हुए बोले,
"अरे ओ साधु महाराज! यहाँ किस आस में बैठे हो? पहले ने उपहास उड़ाते हुए कहा|
"सब गाँव छोड़कर शहरों में जा चुके हैं| न तो अपने-आप यहाँ रहते, न ही किसी को बसने देते|" तीसरा बोला|
"ऐसा करते हैं, साधु महाराज को अपने साथ, अपने गाँव लिए चलते हैं|" चौथे ने बाबा की पोटली टटोलते हुए साथियों की तरफ इशारा करते हुए कहा|
"यहाँ कुछ नहीं मिलने वाला| चलो, उठो महाराज! |" दूसरा महाराज की तरफ हाथ बढ़ाते हुए बोला|
उनके खौफनाक चेहरे और मुख से आती
दुर्गंध ने साधु महाराज को भयभीत कर दिया। डर के मारे उनके मुख से एक शब्द न फूटा।
जैसे ही वे युवक आगे बढ़े, साधु महाराज भी तुरंत वहाँ से उठ खड़े हुए।
थोड़ा आगे बढ़े ही थे कि एक झोपड़ी की चौखट पर ढिबरी की मद्धम रोशनी में एक वृद्ध दंपत्ति बैठे दिखाई दिए। साधु महाराज की डूबती सांसों को तिनके का सहारा मिला। वे तेज़ कदमों से आँगन की ओर बढ़े|
लेकिन साधु को देखते ही वृद्ध दंपत्ति यकायक बंद किवाड़ों के भीतर सिमट गए। उनका दया-भाव, अपना-पराया, आस्था और विश्वास जैसे शब्दों पर से मानो भरोसा ही टूट चुका था| औलाद सुख के लिए संत-महात्मा से लेकर भगवान की कोई ऐसी चौखट न थी, जहाँ उन्होंने नाक न रगड़ी हो| औलाद का सुख न सही, गरीब नाते रिश्तेदारों के बच्चों को माँ-बाप से बढ़कर प्यार-दुलार दिया| उनकी परवरिश और पढ़ाई-लिखाई के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया| आखिर में हासिल क्या हुआ? सोचकर उनके मन को गहरा आघात पहुँचा |
"द्वार खोलो माई..., काशी से शिव दूत आया है| भोले नाथ जी कृपा करेगें|" बाबा ने कातर स्वर में बार-बार आवाज़ दी, लेकिन भीतर का सन्नाटा न टूटा|
थक-हारकर साधु महाराज ने उसी आँगन के एक छोर पर रात काटने का फैसला किया। तसल्ली बस इतनी थी कि उनके आस-पास जीवित इंसान तो हैं। खाली पेट, चिलम के कश खींचते हुए साधु महाराज ने हाड़ कंपाने वाली जाड़ों की वह रात काट ली। सुबह की पहली किरण फूटने से पहले ही वह अपने अगले पड़ाव की ओर निकल पड़े।
सुबह जब बूढ़े दंपत्ति ने आहिस्ता से कपाट
खोले, तो आँगन
सूना था। जिस कोने में साधु ने रात गुजारी, वहाँ से अब भी धुँआ उठ रहा था।
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