बुधवार, 17 जून 2026

लघु कथा : अविश्वास का धुआँ

     ढलती सांझ के धुंधलके में एक साधु महाराज भिक्षा मांगते हुए एक अनजाने गाँव की सीमा में दाखिल हुए। अजीब सन्नाटा था। वह जिस भी ड्योढ़ी पर कदम रखता, वहाँ एक भारी ताला उसका स्वागत करता। देखते ही देखते रात का अंधकार गहराने लगा। आस-पास कोई दूसरा ठिकाना भी न था। संकट की इस घड़ी में वह एक वीरान मकान के ओटारे पर बैठ अपनी नियति को टटोलने लगे।

अचानक अँधेरे से चार साए उभरे। शराब के नशे में धुत उन युवकों ने साधु को देखा और अट्टहास करते हुए बोले, "अरे ओ साधु महाराज! यहाँ किस आस में बैठे हो? इस गाँव को तो हम पहले ही टटोल चुके हैं, यहाँ कुछ नहीं बचा।" उनकी बातों और देह से आती दुर्गंध ने साधु महाराज के मन में सिहरन पैदा कर दी। उन्होंने मौन रहने में ही भलाई समझी। जैसे ही वे युवक आगे बढ़े, साधु महाराज भी तुरंत वहाँ से उठ खड़े हुए।

कुछ दूर चलने पर भगवान का सहारा दिखा। एक ढहती हुई झोपड़ी की चौखट पर एक वृद्ध दंपत्ति बैठे थे। साधु की डूबती सांसों को तिनके का सहारा मिला। वे तेज़ कदमों से आँगन की ओर बढ़े| लेकिन बाबा को देखते ही वृद्ध दंपत्ति यकायक भीतर चले गए और किवाड़ बंद कर लिए। उनका दया-भाव, अपना-पराया, आस्था-विश्वास जैसे आखरों पर से मानों भरोसा ही टूट चुका था| बाबा ने कातर स्वर में आवाज़ दी, "मैया! द्वार खोलो माई..." पर भीतर पसरी खामोशी नहीं टूटी।

थक-हारकर साधु महाराज ने उसी आँगन के एक छोर पर रात काटने का फैसला किया। तसल्ली बस इतनी थी कि उसके आस-पास दो जीवित इंसान तो थे। खाली पेट, खाली चिलम के कश खींचते हुए साधु महाराज ने वह ठंडी रात काट ली। सुबह की पहली किरण फूटने से पहले ही वह अपने अगले पड़ाव की ओर निकल पड़े।

सुबह जब बूढ़े दंपत्ति ने आहिस्ता से कपाट खोले, तो आँगन सूना था। जिस कोने में साधु ने रात गुजारी, वहाँ से अब भी धुँआ उठ रहा था।

@विजय मधुर 

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