शुक्रवार, 15 मई 2026

गढ़वाली कहानी : द्वी महाराज

      रूड़़यूं का दिन व्य्खुनी को टैम, बिगरू गुठ्यार का किनर उख्र्यळ का नजीक छांटी-छांटी सुखीं पूळयूं बटी मुंगरा न जौ निकळणु छाइ । तबी अमलानंद अर गमलानंद नौ का द्वी महाराज गुठ्यार मा आ धमकीं ।

भक्तू की सदनी जय हो।” द्वियोंल एक दगड़ी जयकार लगै ।

बाबा प्रणाम!” मुंगरा तैं एक तरफां चुलैकी बिगरू द्वियों का खुटों मा नतमश्तक ह्वेगे ।

बाबों को आकर्षक डील-डौल अर मुख पर चल्क्वार देखि बिगरू मंत्रमुग्ध ह्वेगे । याँ से पैली इनमेसी का बाबा वेन कबि नि देखा छा। रेशमी धोती-कुर्ता, सफेद दाड़ी, कान्धुंद कीमती झ्व्ळा, गालुन्द राम नाम को दुसल्ला । नौन्यालू की बेरोजगारी अर ब्योबंद से लेकी परेशान बिगरू तै वो दुया देबदूत से कम नि लगणा छा ।

सड़की बटी गौं को पैलू घौर बिगरु को ही प्वड़दोु छा । गुठ्यार की दिवली मा वूंका वास्ता फौजी काळू कमळू अर वैक एंच नयु-नयु चदरु बिछऐगे अर भुयाॅं मा लोखु का वास्ता ग्रौंड सीट । बिगरू की घरवळी सूमा फटा-फट द्वी गिलास पाणी लेकी आग्ये । गौंका मर्द, ब्य्ठुला, नौना-बाळा बाबों का दर्शन कैरी अफुतैं धन्य मनण लगें । इना सज्यां-धज्यां लाल सुर्ख बाबा पैली धों गौं वलों न देखिन ।

बाबा जी! चा बणवंदया एक-एक कुळा ?” बिगरू न हाथ जोड़ी पूछी ।

हाँ, हम अपणा भक्तू की इच्छा को पूरु मान कर्द्यान । दूध मा पत्ती डाली जरा टपटिपि !” ठुला बाबा अमलानंद न सूमा का तरफ देखि बोली ।

जरुर! जा बिरजू की ब्वे, आज भगवान का रूप मा बाबों का चरण हमर घौर मा पोड़़ीन । धन्य ह्वेग्यों हम । मी तैं इनों लगणू अब हमरी सब्य चिंता-फिकर दूर ह्वे जाली ।” बिगरू न बाबों का तरफ हथ जोड़ी बोली ।

बाबों न अपण हथ आशीर्वाद का रूप मा ऐंच करी देन । अभी बाबा बैठा ही छा कि अपणु भाग दिखाण वळों की लंग्यात लगिगे ।

महाराज जरा हमर ये छ्वारा को हथ देखि बतावा, ऐकी नौकरी किलै नि लगणी हवेली ? द्वी दफा अग्निवीर की परीक्षा पास कैरी याली पण आखिरी धां झणी क्य मेस बिग्ड़द अड्खी जान्द बिचरू । तीन दफा हौरी परीक्षा देनी त वूंका पेपर लीक होण का वजै से परीक्षा रद्द ह्वेगीं । ठ्य्कादार की मेहरबानी से बड़ा साहब का कोठी मा लग त वख बटी भि निकाल दे, जोग ही खराब च। अब त नौकरी की उम्र भि जाण वली च।” श्यामू न हथ जोड़ी बाबा अमलानंद का खुटों मा सिर झुकैई दे।

बच्चा! एकी ग्रह चाल उल्टी दिशा मा चलणी । दिशा बदलण का वास्ता उपाय करण प्वाड़्लू, लगी जाली नौकरी । थोड़ा खर्च लगलू ।”  बाबा अमलानंद न लम्बी सांस लेकी बोली ।

खर्चा की फिकर नि कारा बाबा। मि आज ही एक खस्सी ब्वगठ्या बिकै देन्दु । बस तुम एकु भलु कैरी दियां । मी तुमरू अहसान जिन्दगी भर नि भुलुलू ।” अपना आंसू फुंजद-फुंजद श्यामू को गला रूंधगे ।

भोल सुबेर पांच बजी एतैं लेकी आ जयां ।” बाबा अमलानंद जी न सुरजू का मुंड पर हथ फेरी ।

महाराज ! म्यारा ये ज्याठ नौना को टिपड़ा मिलणा का बाद भि ब्यो को संजोग नि होणु । हम भौत परेशान छौं । एका पिछने तीन-तीन हौरी लग्याँ छन लंग्यात मा ।” रामू न बाबा गमलानंद से पूछी ।

राती सेण से पैली सब्यों का मुंड मथि साफ रुमाल मा एक मुठी चैंळ, एक मुठी साबुत उड़दी की दाळ, एक गाँठ हळदी अर पांच सौ एक रुपए परोखी सुबेर मैमू दे दियां । जल्दी हवे जालू सब्यों को ब्यो ।” बाबा गमलानंद न रामू की पीठ थप-थपै ।

महाराज ! म्यार नौना कु ब्यो हुन्या सात साल ह्वेगें । पोती-पोता कु मुख द्यखणा को तरसी ग्यूं हम । कत्गा उपै कैरी यलीं, सब व्यर्थ । अब आपकू ही सहारु च ।” बल्लू न बाबा गमलानंद का खुटा पखड़िनी ।

यांका वास्ता एकांत मा बात करण प्वाड़ली । भोल शाम का टैम आ जयां द्वियो तैं लेकी ।” बाबा गमलानंद न अपनी सफेद दाड़ी सहलांद-सह्लांद बोली ।

महराज तीन साल ह्वेगेन । हमारा नौना-बाला सुध लेणु बी नि आणा छन । आप ही देखि ल्यावा हम बूड-बुड्यों को यीं बुढ़ापा मा कना कुदिन होणा छन।” द्विया बूड-बुड्या बाबा गमलानंद का खुटों पोडिगें ।

उठा! यो सब माया-मोह अर कर्मग्त्यूं खेल छन। भगवान् राम को ध्यान कारा सुबेर-शाम ।” बोलदा-बोलदा छ्वटा बाबा न एक रुद्राक्ष वूंका हथ मा थमा दे ।

चा औन्द-औंद तक बाबों न सात-आठ लोखु तैं वूंकी परेशानी को हल बतला दे । ए ही दौरान द्वियों का वास्ता बिगरू न भितर ढकण-डिसाण अर खाण-पीणा व्यवस्था कैरी दे। वे तैं पता छा कि बाबा लोग घाम अछाण का बाद भोजन नि करदा। द्विया बाबा हथ-खुटा ध्वेकी भितर जाण बैठीं गेन ।

भक्तो ! अब हमरु ध्यान-धारणा को टैम हवेगे। भोल सुबेर भेंट होली। तुम्तैं भजन सुणादा पण आज हम भौत थकी गयों । जब तैं ये गौं का हरेक भक्त की परेशानी को हल नि खोजी द्यूला अग्नै नि बढ़ला । येही वास्ता हमरा महान सिद्धिपुरुष महाराज अमलानंद जी न अमलानाथ बटी यखकु रुख कैरी । सबय ब्वाला अमालानंद महाराज की ... जय ।” जयकारा लगांद-लगांद बाबा गमलानंद ठुला महाराज अमलानंद का खुटों मा दंडवत ह्वेगे ।

द्विया बाबा भितर चली गेन अर जयकारा लगांद-लगांद सब्य लोग अपणा-अपणा घौर चली गेन । गौं का दाना-सेणा बिगरू का घौर से लगदा पंचू का घौर मा तमखू पैण को इंतजाम मा बैठ गेन । मौका देखी बिगरू बी वखी चलीगे । तमखू की तलब वे तैं बी भौत लगीं छ ।

सूण भुला बिगरू ! आज त क्वी बात नी, तिन बाबों तै अपणा घौर आसरा दे दे । भोळ बटी यूंका रैण, चा-पाणी, नाश्ता अर भोजन की व्यवस्था पंचेती-घर मा कैरी दिंदा ।” गौं का सेठ जी न हुक्का थामी अपणी बात रखी ।

बात बिलकुल कैदा की बोली तुमन सेठ जी ।” सिपाल न खंस्दा खंस्दा सेठ जी की बात को समर्थन कैरी ।

भौत बढ़िया । वख कुर्सी, दरी, हारमोनियम, ढोलक, चिमटा सब्य धाणी छन ।” ढोलकी को सल्ली जैपु न अपना द्विया जान्घु पर थाप देकी बोली ।

जन आप लोखु की इच्छा ।” तमखू की सोड़ मरण का बाद बिगरू न जबाब दे ।

बिगरू की घरवाळी, चर्य अणविवाख नौना-नौनी बाबों की सेवा-भाव मा जुटयां छा ।

एक सप्ताह गौं माँ रौण का दौरान, सुबेरे बटी व्य्खुनी तक द्विया बाबों न लोखु का हथ अर माथा की लकीर अपना हिसाब से पढीं । एवज मा आम दक्षिणा - सौ रुपया से लेकी पांच सौ रुपया । कै-कै न त हजारों रूप्या खर्च कैरी देनी । प्रसाद का रूप मा एक-एक रुद्राक्ष की दाणी पैकी गौं वला अफुतैन धन्य समझणा छा । बाबों का अगनै फल-फ्रूट, घी-दूध-दही बावन व्य्न्जनु को भोग अर चढ़ावा । दिन मा आमदनी अर रंगत, राती गमत । बाबा मस्त, सेवा भक्ति अर बाबों की शान्यूं मा नचदा गौं वला पस्त। आपस मा लड़़दा-झगड़़दा गौं को माहौल ये दौरान भक्तिमय ह्वेगे ।

गौं वलों तैं पक्को यकीन ह्वेगे बाबों का आशीर्वाद रूप मा वूं तैं मिलीं रुद्राक्ष, अब वूंकी सरी खैरी-विपदा हैरी दयाली जनकि - बिना डाक्टरी इलाज का रोग कटी जाला, अणविवाख नौना-नौंन्यूं की जमात कम हवे जाली, इस्कोल मा लग्याँ ताळा खुली जाला, बढ्दी बेरोजगारी की वजै से नशाखोरी का गिरफ्त मा जान्द नौन्याळू की संख्या घटी जाली, ढक्यां कूड़यूं का द्वार खुली जाला, बंज्या पुंगड़ा चलदा हवे जाला, गौं-गाळों पसरयाँ स्यू-बाघ बोण लौटी जाला । गौं मा फिर से तीस साल पैली जनि रौनक बौडी जाली।

क्यांखु तैं प्वणयाँ तुम लोग, यूं बाबा लोगु का फेर मा । ये त सकल से ही छट्याँ लग्दन । ब्याळी आंद दफी एक झलक मा ही पछ्याण याला छ मिन वूंका रंग-ढंग । भरवंसा का काबिल नि छन कतैई । अपणा भला का सिवै ये कैकु भलु नि कैरी सकदा ।” फौज बटी छटुटी अयां एजुकेशन हवलदार अमरू न राती गमत बटी लौटदै अपणी माँ अर घरवळी समझै । 

बात गुठ्यार का रास्ता अपणा घौर जांदी बोडी का कन्दूड पोड़गे ।

सुबेर होण से पैली द्विया बाबा जन अचंणचकी गौं मा पैदा हवे छा तनी जम्पत हवेगीं । बाबों को जाणु लोखु तैं भौत अखिरी । वो अपना आपस मा बोलणा छ, ‘साधु का वेश मा साक्षात् भगवान का रूप अर अंतर्यामी छा बाबा ।’ दुफरा बाद पूरा इलाका का दगड़े-दगड गौं मा इनो सूड-बथों अर ढांडू पोड़़ी कि डाळ-बोटों मा लग्याँ फल-फूल त क्य फौंकों अर पत्तों को बी भुयां लमडीसाण लगीगे । लोखु की आशंका यकीन मा बदलिगे । ‘जरुर यो अमरु की कारिस्तानी को फल च, जैकी सजा सब्यों तै मिलणी च ।’ सरी गौं मा वेकी थू-थू ह्वेगे । सम्भल्दा-सम्भल्दा भि बिगरू की बचीं जौ की पूळी अर बूखु बथों मा उड़िगे । बचिगे त खाली गुठ्यारा का एक छोड़ पर दीवली का सार खड़ू मुंगरु ।

@विजय मधुर१५५२६ 

3 टिप्‍पणियां:

  1. बेनामी11:26 pm

    बढ़िया

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    1. धन्यवाद | श्रीमानजी अपण नौ भि लेखि देंदा त भलु रैंदु |

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  2. AI/ChatGPT द्वारा तैयार की गई समीक्षा :
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    विजय मधुर जी की प्रसिद्ध और हालिया गढ़वाली कहानी "द्वी महाराज" (दो महाराज) का सार और मुख्य भाव नीचे दिया गया है:कहानी का सारांश: "द्वी महाराज"यह कहानी पहाड़ के सीधे-सादे ग्रामीणों के अंधविश्वास और पाखंडी बाबाओं के जाल में फंसने की मानसिकता पर एक तीखा व्यंग्य करती है।बाबाओं का आगमन: गर्मियों के दिनों में 'बिगरू' नाम का ग्रामीण अपने आंगन (गुठ्यार) में काम कर रहा होता है, तभी वहाँ 'अमलानंद' और 'गमलानंद' नाम के दो हट्टे-कट्टे, रेशमी धोती-कुर्ता पहने और आकर्षक दिखने वाले बाबा आ धमकते हैं।गांव वालों की परेशानी: पहाड़ के भोले-भाले ग्रामीण अपनी रोज़मर्रा की दिक्कतों (जैसे बच्चों की बेरोज़गारी, शादी-ब्याह न होना, संतान न होना, और बुढ़ापे की लाचारी) को लेकर बाबाओं के चरणों में गिर जाते हैं।ठगी का धंधा: बाबा सबका हाथ और कुंडली देखने का नाटक करते हैं। वे ग्रहों की चाल ठीक करने के नाम पर किसी से मोटी दक्षिणा मांगते हैं, तो किसी से अनाज, हल्दी, और ₹501 का प्रसाद चढ़ाने को कहते हैं। लोग अपनी मेहनत की कमाई और मवेशी बेचकर भी पैसा देने को तैयार हो जाते हैं।अंधविश्वास की पराकाष्ठा: एक हफ्ते तक गांव में इन बाबाओं का खूब आदर-सत्कार होता है। लोग मानने लगते हैं कि बाबाओं के दिए रुद्राक्ष से बिना डॉक्टर के बीमारियाँ ठीक हो जाएंगी, बेरोज़गारी खत्म होगी, और बंद पड़े स्कूल खुल जाएंगे।सच्चाई का आईना: सेना से छुट्टी पर आया पढ़ा-लिखा फौजी 'अमरू' अपनी मां और पत्नी को समझाता है कि ये बाबा शक्ल से ही ठग लगते हैं और भरोसे के काबिल नहीं हैं।अंजाम: सुबह होने से पहले ही दोनों बाबा सारा चढ़ावा समेटकर अचानक गायब (चंपत) हो जाते हैं। दोपहर बाद क्षेत्र में एक भयंकर आंधी-तूफान आता है, जिससे बची-कुची फसल भी बर्बाद हो जाती है। लेकिन अपनी आंखें खोलने के बजाय, अंधविश्वासी ग्रामीण उल्टा अमरू को ही कोसने लगते हैं कि उसने बाबाओं का अपमान किया था, इसलिए यह आपदा आई है।कहानी का मूल संदेशविजय मधुर जी ने इस कहानी के माध्यम से समाज में फैले अंधविश्वास, ढोंग और पाखंड पर कड़ा प्रहार किया है। वे संदेश देते हैं कि समस्याओं का समाधान कर्म, शिक्षा और सही समझ से होता है, न कि पाखंडी तांत्रिकों और बाबाओं के चक्कर में पड़ने से।यदि आप उत्तराखंड के इस समकालीन साहित्य या विजय मधुर जी की किसी अन्य रचना के बारे में और अधिक चर्चा करना चाहते हैं, तो अवश्य बताएं!

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