गाँव और स्कूल के बीच पगडंडी के किनारे खड़ा वह इकलौता पिलखन का वृक्ष हर मौसम में सदैव हरा-भरा रहता था। स्कूल से लौटते वक्त सावी अपनी सहेलियों के साथ उसके नीचे बने चबूतरे पर बैठ जाती और सब एक-दूसरे को कहानियाँ सुनाने लगतीं। गर्मियों के दिनों में तो उसकी घनी छांव में बच्चे, बूढ़े और महिलाएँ ही नहीं, बल्कि मवेशी भी सुस्ताने के लिए रुक जाते थे। धीरे-धीरे सावी को वह पेड़ आस-पास के अन्य पेड़ों से कहीं अधिक प्रिय लगने लगा, जबकि गाँव और स्कूल के रास्ते में फल-फूल के एक से बढ़कर एक वृक्ष थे।
जब भी मौका मिलता, सावी
उसके तने से पीठ सटाकर देर तक बैठी रहती। वह अपने बालपन की कहानियाँ उसे सुनाती और
उसका अकेलापन दूर करने का प्रयास करती। उसकी सहेलियाँ घर पहुँच जातीं, लेकिन वह तब तक वहीं डटी रहती जब तक कि कोई
राहगीर वहाँ न आ पहुँचता। घर पर माता-पिता के पूछने पर वह एक्स्ट्रा क्लास या
सांस्कृतिक कार्यक्रम की तैयारी का बहाना बना देती। माँ-बाप भी उस पर यकीन कर लेते
क्योंकि सावी थी ही इतनी समझदार और बुद्धिमान लड़की। वह अपनी पढ़ाई से लेकर घर के
कामों तक, हर चीज़ में निपुण थी। सारा गाँव और
नाते-रिश्तेदार उसकी तारीफ करते नहीं थकते थे।
रास्ते के किनारे अकेले खड़े उस पेड़ को भी सावी का इस तरह तने से पीठ
सटाकर बैठना और बतियाना खूब भाने लगा था। सावी के आते ही उसका रोम-रोम खिल उठता,
पत्तियाँ खुशी से झूमने लगतीं और उसकी पतली
टहनियों में उड़ कर आये अटके हुए फूल खुद-ब-खुद सावी के ऊपर झड़ने लगते। पेड़ की यह
हरकतें देख सावी का मन गद्गद हो जाता। इस छोटी सी उम्र में उसे पहली बार अनूठे
प्यार की अनुभूति हुई थी। उसने लाड से उस पिलखन के पेड़ का नाम 'लखन' रख
दिया।
स्कूल की खास सहेलियाँ भी आते-जाते वक्त उसे चिढ़ाती थीं,
"सावी! हम तो घर चल रहे हैं। तू कर
अपने अकेले, बेचारे लखन से प्यार भरी
बातें!"
“मारूंगी...” कहकर सावी स्कूल का बैग एक तरफ रखती और दौड़कर पेड़ से
लिपट जाती।
लेकिन समय बदलते देर नहीं लगती। सावी अपनी बारहवीं की पढ़ाई पूरी कर
उच्च शिक्षा के लिए एक दिन शहर चली गई। शहर की इस भागदौड़ भरी ज़िंदगी में भी वह
हर पल अपने लखन को याद करती और कभी-कभी तो उसकी याद में उसकी आँखें भर आतीं।
एक बार वह अपने कॉलेज मित्रों के साथ बहुत बड़े और सुंदर सुसज्जित पार्क
में पिकनिक मनाने चली गयी | वहाँ उसे उसके जैसे चार पेड़ दिखाई दिये | वह एक-एक कर
सबके पास गयी उनके तनों को छूकर लखन के सानिध्य पाने की चेष्टा की लेकिन सब व्यर्थ
| वापस आकर दोस्तों के संग उदास होकर बैठ गयी | दोस्तों ने उसे लाख पूछने का
प्रयास किया मगर वह कुछ न बोली |
जिस घड़ी का उसे बेसब्री से इंतज़ार था, आखिरकार वह आ ही गई। कॉलेज में दस दिनों की छुट्टियाँ हो गईं और सावी
अगले ही दिन गाँव के लिए निकल पड़ी। बस से उतरते ही वह घर जाने के बजाय भागी-भागी
सीधे अपने लखन के पास पहुँची।
पर वहाँ पहुँचते ही वह ठिठक गई। उस जगह का नज़ारा पूरी तरह बदल चुका
था। यह देखकर वह चक्कर खाकर ज़मीन पर गिरने ही वाली थी कि मानो किसी अदृश्य शक्ति
ने उसे अपनी बाहों में थामकर चोट खाने से बचा लिया हो। वहाँ लखन की निशानी के तौर
पर एक पत्ता तक शेष न था। पुरानी पगडंडी की जगह एक चौड़ी, बेजान सड़क ने अपने हाथ-पैर फैला दिए थे। सावी ने शून्य में ताकते हुए
भारी मन से खुद से कहा, “कुछ
दिनों बाद इस सड़क पर गाड़ियाँ दौड़ने लगेंगी...”
यही सोचकर अपने उमड़ते आँसुओं को पीकर, वह भारी कदमों से गाँव की ओर बढ़ गई।
@विजय मधुर